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परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमला विश्व शांति के लिए गंभीर संकट

यूएई के बराकाह संयंत्र पर ड्रोन हमले से गहराया पश्चिम एशिया का तनाव, भारत ने जताई तीखी चिंता

पश्चिम एशिया (मध्य पूर्व) में जारी भू-राजनीतिक अस्थिरता और संघर्ष अब एक ऐसे खतरनाक मोड़ पर पहुंच गए हैं जो न केवल क्षेत्रीय सुरक्षा, बल्कि संपूर्ण वैश्विक व्यवस्था के लिए विनाशकारी सिद्ध हो सकते हैं। हाल ही में संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के अत्यंत महत्वपूर्ण ‘बराकाह परमाणु ऊर्जा संयंत्र’ (Barakah Nuclear Energy Plant) के निकट हुआ ड्रोन हमला इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। इस संवेदनशील परमाणु प्रतिष्ठान को निशाना बनाकर किए गए कायरतापूर्ण हमले के पीछे ईरान समर्थित चरमपंथी गुटों का हाथ होने का गहरा संदेह जताया जा रहा है। वैश्विक ऊर्जा और सुरक्षा गलियारों में मचे इस हड़कंप के बीच, भारत सरकार ने इस घटना पर अत्यंत तीखी और गहरी चिंता व्यक्त की है। भारत की यह प्रतिक्रिया केवल एक राजनयिक औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह परमाणु आतंकवाद (Nuclear Terrorism) के विरुद्ध उसकी ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति को रेखांकित करती है।

बराकाह परमाणु संयंत्र का सामरिक और आर्थिक महत्व:
अबू धाबी के अल धफरा क्षेत्र में स्थित बराकाह परमाणु ऊर्जा संयंत्र अरब जगत का पहला वाणिज्यिक परमाणु ऊर्जा स्टेशन है। यह यूएई की कुल बिजली आवश्यकता का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा अकेले पूरा करता है और देश के कार्बन-मुक्त ऊर्जा लक्ष्यों की रीढ़ है। रणनीतिक दृष्टिकोण से, इस तरह के एक बड़े और सक्रिय न्यूक्लियर पावर प्लांट के निकट ड्रोन हमला होना बेहद भयावह है। यदि यह ड्रोन सीधे तौर पर रिएक्टरों या उनके कूलिंग सिस्टम को क्षति पहुंचाने में सफल हो जाता, तो यह चेरनोबिल या फुकुशिमा जैसी भयानक परमाणु त्रासदी को जन्म दे सकता था, जिसका रेडियोधर्मी प्रभाव (Radioactive Fallout) पूरे खाड़ी देश और उसके आस-पास के क्षेत्रों को अपनी चपेट में ले लेता। यही कारण है कि इस हमले को अंतरराष्ट्रीय नियमों और जेनेवा कन्वेंशन का घोर उल्लंघन माना जा रहा है।

ईरान समर्थित गुटों का संदेह और छद्म युद्ध (Proxy War):
प्रारंभिक खुफिया रिपोर्टों और सुरक्षा विश्लेषकों के अनुसार, इस हमले में इस्तेमाल किए गए ड्रोन की तकनीक और हमला करने की शैली यमन के हौथी विद्रोहियों या इराक स्थित अन्य ईरान समर्थित शिया मिलिशिया गुटों से मेल खाती है। पिछले कुछ समय से अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच बढ़ते सीधे तनाव के कारण, खाड़ी क्षेत्र में ‘छद्म युद्ध’ (Proxy War) अत्यंत तीव्र हो गया है। होर्मुज जलडमरूमध्य और लाल सागर में व्यापारिक जहाजों को निशाना बनाने के बाद, अब नागरिक और ऊर्जा बुनियादी ढांचों (Energy Infrastructure) पर इस प्रकार के आत्मघाती ड्रोन हमले यह दर्शाते हैं कि ये उग्रवादी गुट किसी भी सीमा तक जाने को तत्पर हैं।

भारत की गहरी चिंता के निहितार्थ:
भारत द्वारा इस हमले की त्वरित और कड़े शब्दों में निंदा किए जाने के पीछे कई अत्यंत महत्वपूर्ण रणनीतिक और आर्थिक कारण हैं:

सामरिक साझेदारी और द्विपक्षीय संबंध: भारत और यूएई के संबंध वर्तमान में अपने सबसे स्वर्णिम दौर में हैं। दोनों देशों ने हाल ही में रक्षा, ऊर्जा और सामरिक तेल भंडार से जुड़े ऐतिहासिक समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। यूएई की सुरक्षा को सीधे तौर पर भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा से जोड़कर देखता है।

भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा: संयुक्त अरब अमीरात में लगभग 35 लाख से अधिक भारतीय नागरिक रहते हैं और कार्य करते हैं। खाड़ी क्षेत्र में किसी भी प्रकार की अस्थिरता या परमाणु संकट सीधे तौर पर वहां रह रहे लाखों भारतीयों के जीवन को खतरे में डाल सकता है।

वैश्विक ऊर्जा बाजार पर प्रभाव: भारत अपनी आवश्यकता का एक बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता है। बराकाह जैसे ऊर्जा केंद्रों पर हमलों से कच्चे तेल और गैस की वैश्विक कीमतों में भारी उछाल आना तय है, जिसका सीधा और नकारात्मक प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था और आम उपभोक्ताओं पर पड़ेगा।

वैश्विक समुदाय के समक्ष नई चुनौती:
इस घटना ने संयुक्त राष्ट्र (UN) और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के समक्ष एक नया संकट खड़ा कर दिया है। युद्ध और संघर्षों में ड्रोन तकनीक के बढ़ते और अनियंत्रित उपयोग ने पारंपरिक हवाई रक्षा प्रणालियों (Air Defense Systems) की सीमाओं को चुनौती दी है। अब समय आ गया है कि वैश्विक शक्तियां एक मंच पर आएं और परमाणु प्रतिष्ठानों को किसी भी सैन्य या उग्रवादी कार्रवाई से पूरी तरह मुक्त रखने के लिए एक बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय कानून का निर्माण करें।

यूएई के बराकाह परमाणु संयंत्र के निकट हुआ यह ड्रोन हमला संपूर्ण विश्व के लिए एक खतरे की घंटी है। उग्रवादी गुटों द्वारा परमाणु ठिकानों को युद्ध के मैदान में खींचने का यह प्रयास पूरी मानवता के अस्तित्व के साथ खिलवाड़ है। भारत ने इस संकट पर अपनी गंभीर चिंता व्यक्त करके यह स्पष्ट कर दिया है कि वह वैश्विक शांति और आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में यूएई और अपने सहयोगियों के साथ मजबूती से खड़ा है। पश्चिम एशिया के इस सुलगते तनाव को शांत करने के लिए अब कूटनीतिक संवाद और चरमपंथी गुटों पर सख्त वैश्विक प्रतिबंध लगाने की नितांत आवश्यकता है, अन्यथा इसके आर्थिक और मानवीय परिणाम पूरे विश्व को भुगतने होंगे।