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कूटनीतिक बिसात और क्षेत्रीय सुरक्षा

म्यांमार के राष्ट्रपति यू मिन आंग ह्लाइंग का भारत दौरा, जानें क्या हैं इसके भू-राजनीतिक मायने

भारत की ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ (Act East Policy) और सीमा सुरक्षा के लिहाज से 30 मई 2026 को होने जा रहा म्यांमार के राष्ट्रपति यू मिन आंग ह्लाइंग का भारत दौरा अत्यंत महत्वपूर्ण है। वर्ष 2021 के सैन्य तख्तापलट के बाद म्यांमार भारी आंतरिक अशांति और गृहयुद्ध जैसी स्थिति का सामना कर रहा है। ऐसे संवेदनशील समय में उनका नई दिल्ली आना न केवल भारत-म्यांमार द्विपक्षीय संबंधों के लिए, बल्कि दक्षिण-पूर्व एशिया में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए भी एक बड़ा कूटनीतिक कदम माना जा रहा है।

विस्तृत विश्लेषण:
म्यांमार भारत का एकमात्र ऐसा पड़ोसी देश है जो दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के संगठन (ASEAN) का सीधा प्रवेश द्वार है। भारत और म्यांमार के बीच 1643 किलोमीटर लंबी अचिह्नित (Unfenced) सीमा है, जो पूर्वोत्तर के 4 राज्यों—अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर और मिजोरम—से लगती है।

राष्ट्रपति आंग ह्लाइंग की इस यात्रा के दौरान राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल और प्रधानमंत्री के साथ होने वाली उच्च स्तरीय वार्ताओं में मुख्य रूप से तीन बड़े मुद्दों पर महामंथन होगा:

सीमा सुरक्षा और उग्रवाद: म्यांमार में सेना (जुंटा) और विद्रोही गुटों (Ethnic Armed Organizations) के बीच चल रही हिंसक झड़पों के कारण हजारों शरणार्थी मिजोरम और मणिपुर में प्रवेश कर चुके हैं। भारत म्यांमार के नेतृत्व पर यह दबाव बनाएगा कि वह भारतीय विद्रोही गुटों (जैसे उल्फा और एनएससीएन) को म्यांमार की धरती का उपयोग सुरक्षित पनाहगाह के रूप में न करने दे।

चीन का बढ़ता प्रभाव: म्यांमार में अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण चीन ने अपना आर्थिक और सैन्य दखल बहुत बढ़ा लिया है (विशेषकर क्यौकप्यू बंदरगाह)। भारत को अपने सामरिक हितों को सुरक्षित रखने के लिए म्यांमार के सैन्य प्रशासन के साथ व्यावहारिक संबंध (Pragmatic Relations) बनाए रखना मजबूरी भी है और जरूरत भी।

कालादान मल्टी-मोडल प्रोजेक्ट: वर्षों से लंबित ‘कालादान मल्टी-मोडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट’ (Kaladan Project) को तेजी से पूरा करने पर एक नया समझौता हो सकता है, जो भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को म्यांमार के सितवे (Sittwe) बंदरगाह के जरिए सीधे समुद्र से जोड़ेगा।

भारत का रुख म्यांमार को लेकर बहुत नपा-तुला रहा है। एक तरफ भारत म्यांमार में लोकतंत्र की बहाली का समर्थक है, तो दूसरी तरफ अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए वह वर्तमान सैन्य प्रशासन को भी नजरअंदाज नहीं कर सकता।