ट्राईफेड ने जनजातीय वस्त्रों, कढ़ाई और हस्तशिल्प को बढ़ावा देने के लिए विशेष आरआईएसए स्टोर का किया शुभारंभ

नई दिल्ली ( अभिषेक सिंह) : जनजातीय कार्य मंत्रालय ने भारतीय जनजातीय सहकारी विपणन विकास संघ (ट्राईफेड) के माध्यम से आज ‘आरआईएसए – टाइमलेस ट्राइबल’ नामक एक प्रीमियम ब्रांड का अनावरण किया, जो जनजातीय वस्त्रों, कढ़ाई और हस्तशिल्पों के लिए समर्पित है। साथ ही, नई दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित राजीव गांधी हस्तशिल्प भवन की गैलरी संख्या 2 में विशेष आरआईएसए स्टोर का उद्घाटन किया गया। यह पहल माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के ‘विकसित भारत’ के विजन के अनुरूप है, जो भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करते हुए जनजातीय समुदायों के आर्थिक सशक्तिकरण के माध्यम से समावेशी विकास को बढ़ावा देती है।
आरआईएसए पहल की परिकल्पना आदिवासी उत्पादों के लिए एक विशिष्ट ब्रांड पहचान बनाने, आदिवासी कारीगरों के लिए बाजार संबंधों को मजबूत करने, डिजाइन विकास और उत्पाद विविधीकरण को सुविधाजनक बनाने और प्रीमियम घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में आदिवासी विरासत को बढ़ावा देने के लिए की गई है।
कार्यान्वयन के पहले चरण के अंतर्गत, सांस्कृतिक महत्व और बाजार क्षमता के आधार पर सात आदिवासी वस्त्र और कढ़ाई परंपराओं की पहचान की गई है। इनमें असम का एरी रेशम और मूगा रेशम, झारखंड का संताल कपास, लद्दाख का चांगपा पश्मीना, ओडिशा का कोटपाड कपास और डोंगरिया कढ़ाई तथा तमिलनाडु की टोडा कढ़ाई शामिल हैं।
यह पहल वस्त्र मंत्रालय के अधीन एक स्वायत्त संगठन, राष्ट्रीय डिजाइन केंद्र (एनडीसी) के माध्यम से कार्यान्वित की जा रही है। इस परियोजना में डिजाइन विकास, वस्त्रों के प्रोटोटाइप का निर्माण, आदिवासी बुनकरों और कारीगरों की क्षमता निर्माण, सिलाई सुविधाओं की स्थापना, बुनाई और हस्तशिल्प समूहों को सुदृढ़ करना और उत्पाद प्रस्तुति और पैकेजिंग में सुधार शामिल है।
इस पहल के पहले चरण में चुनिंदा आदिवासी हस्तशिल्पों, जैसे मणिपुर की लोंगपी पॉटरी, लद्दाख की तुरतुक पीतल की कटलरी और छत्तीसगढ़ की डोखरा कला का लक्षित प्रचार भी शामिल है, जिसका उद्देश्य उनके बाजार की पहुंच का विस्तार करना और कारीगर समुदायों के लिए आय के अवसरों को बढ़ाना है।
आरआईएसए पहल से आदिवासी समुदायों, विशेष रूप से महिला कारीगरों के आर्थिक सशक्तिकरण में योगदान मिलने की उम्मीद है, साथ ही सांस्कृतिक संरक्षण, दीर्घकालिक उत्पादन प्रणालियों और राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में आदिवासी उत्पादों की अधिक दृश्यता को बढ़ावा मिलेगा।