ओमान तट पर भारतीय नाविकों की मौत
विदेश मंत्री एस. जयशंकर का वाशिंगटन को कड़ा संदेश, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो से फोन पर जताया सख्त विरोध

अभिषेक सिंह/ नई दिल्ली | ओमान के तट पर अमेरिकी मिसाइल हमले के ‘क्रॉसफायर’ में तीन निर्दोष भारतीय नाविकों की दर्दनाक मौत के मामले ने अब एक गंभीर कूटनीतिक विवाद का रूप ले लिया है। इस दुखद घटना पर देश के भीतर बढ़ते जनाक्रोश के बीच, भारत सरकार ने वाशिंगटन के खिलाफ अपना रुख बेहद कड़ा कर लिया है। भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने अमेरिकी विदेश मंत्री (Secretary of State) मार्को रुबियो (Marco Rubio) से फोन पर सीधी और तल्ख बातचीत की है। इस दौरान जयशंकर ने अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के दौरान हुई इस बड़ी चूक पर भारत का ‘सख्त ऐतराज’ और गहरा विरोध दर्ज कराया है। नई दिल्ली ने साफ कर दिया है कि रणनीतिक साझेदारी अपनी जगह है, लेकिन वैश्विक समुद्र में भारतीय नागरिकों की सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता।
बंद कमरे से हॉटलाइन तक: जयशंकर-रुबियो बातचीत के इनसाइड डिटेल्स
साउथ ब्लॉक के सूत्रों के मुताबिक, यह फोन कॉल कोई सामान्य कूटनीतिक शिष्टाचार नहीं था, बल्कि इसमें भारत की तरफ से बेहद सख्त लहजा अख्तियार किया गया था। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के सामने तीन मुख्य और कड़े बिंदु रखे:
जवाबदेही तय हो: भारत ने इस बात की मांग की है कि ओमान तट के पास कमर्शियल शिपिंग लेन में मिसाइल दागने से पहले अमेरिकी नौसेना ने स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOPs) का पालन क्यों नहीं किया?
‘कोलेटरल डैमेज’ की दलील नामंजूर: जयशंकर ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि निर्दोष इंसानी जिंदगियों, विशेषकर भारतीय नाविकों की मौत को केवल एक ‘सैन्य दुर्घटना’ या कोलेटरल डैमेज मानकर रफा-दफा नहीं किया जा सकता।
पारदर्शी जांच की मांग: भारत ने अमेरिका से इस पूरी घटना की एक उच्च-स्तरीय और पारदर्शी जांच रिपोर्ट तुरंत साझा करने को कहा है, ताकि यह साफ हो सके कि मिसाइल का निशाना चूकने की असली वजह क्या थी।
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने इस घटना पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए मृतकों के परिवारों के प्रति संवेदना जताई है और वाशिंगटन की तरफ से इस मामले की गहन समीक्षा करने का आश्वासन दिया है।
लाल सागर से ओमान की खाड़ी तक असुरक्षा का साया
यह घटना उस समय हुई है जब पश्चिम एशिया (Middle East) में अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य टकराव अपने चरम पर पहुंच चुका है। ओमान की खाड़ी और लाल सागर (Red Sea) का यह पूरा इलाका इस समय बारूद के ढेर पर बैठा है।
इस व्यापारिक समुद्री मार्ग से दुनिया का एक-तिहाई से अधिक कार्गो गुजरता है, और वैश्विक मर्चेंट नेवी में लगभग 12 से 15 प्रतिशत कार्यबल भारतीय नाविकों का है। अमेरिकी मिसाइल के इस क्रॉसफायर ने दुनिया भर के जहाजों पर तैनात लाखों भारतीय नाविकों और उनके परिवारों के भीतर एक गहरा खौफ पैदा कर दिया है। यदि अंतरराष्ट्रीय शक्तियों की आपसी लड़ाई में इसी तरह कमर्शियल जहाजों को निशाना बनाया जाता रहा, तो वैश्विक व्यापार पूरी तरह से ठप हो जाएगा।
भारत का अगला कदम: कूटनीति के साथ नौसैन्य सुरक्षा का जाल
विदेश मंत्री की इस सख्त कूटनीतिक घेराबंदी के समानांतर, भारत ने जमीन और समंदर पर अपनी सुरक्षा तैयारियों को भी आक्रामक रूप दे दिया है। विदेश मंत्रालय ने जहां एक तरफ उन अफवाहों को सिरे से खारिज किया है जिनमें एक और भारतीय जहाज ‘MT Liaki Freedom’ पर हमले का दावा किया जा रहा था, वहीं दूसरी तरफ भारतीय नौसेना को हाई-अलर्ट पर डाल दिया गया है।
खाड़ी क्षेत्र और लाल सागर में व्यापारिक जहाजों को सुरक्षित रास्ता (Safe Corridor) देने के लिए भारतीय नौसेना ने अपने अत्याधुनिक युद्धपोतों की पेट्रोलिंग और गश्त को दोगुना कर दिया है। भारत अब केवल अमेरिका या अन्य अंतर्राष्ट्रीय ताकतों के भरोसे अपने नागरिकों को नहीं छोड़ने वाला।
जयशंकर और मार्को रुबियो की यह बातचीत साबित करती है कि 2026 का भारत अपनी विदेश नीति में ‘नागरिक प्रथम’ (Citizens First) के सिद्धांत पर चलता है। अमेरिका के साथ कितने ही मज़बूत रणनीतिक या रणनीतिक संबंध क्यों न हों, जब बात किसी भारतीय के खून की आएगी, तो नई दिल्ली का रुख उतना ही बेबाक और सख्त होगा, जितना आज वाशिंगटन ने महसूस किया है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद अहम होगा कि अमेरिका इस चूक की क्या भरपाई करता है और भविष्य में ऐसे हादसों को रोकने के लिए क्या ठोस कदम उठाता है।