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36 साल के लंबे ‘वनवास’ के बाद जगी उम्मीद की किरण

कश्मीर घाटी में पंडितों की वापसी का ब्लूप्रिंट तैयार, डेलिगेशन ने लिया जमीनी हालात का जायजा

राघवेंद्र प्रताप सिंह/ श्री नगर/नई दिल्ली: 1990 की वह सर्द और खौफनाक रातें आज भी हर कश्मीरी पंडित के जेहन में एक नासूर की तरह जिंदा हैं, जब दहशतगर्दी के खौफ से रातों-रात उन्हें अपनी ही मातृभूमि से बेदखल कर दिया गया था। 36 साल के इस लंबे और पीड़ादायक ‘वनवास’ के बाद, अब एक बार फिर से कश्मीर की फिजाओं में विस्थापित पंडितों की वापसी की उम्मीदें परवान चढ़ने लगी हैं। हाल ही में कश्मीरी पंडितों के एक विशेष प्रतिनिधिमंडल (Delegation) ने पूरे 6 दिनों तक कश्मीर घाटी का सघन दौरा किया। इस दौरे का मुख्य मकसद महज़ पुरानी यादों को ताज़ा करना या पर्यटन नहीं था, बल्कि वापसी की जमीनी हकीकत, सामाजिक स्वीकार्यता और सुरक्षा के हालात का सीधा मूल्यांकन (Assessment) करना था।

6 दिनों का अहम दौरा: हेरिटेज साइट्स से लेकर स्थानीय संवाद तक
प्राप्त जानकारी के अनुसार, विस्थापित कश्मीरी पंडितों के इस दल ने इस दौरान कश्मीर के विभिन्न प्राचीन हेरिटेज साइट्स, खंडहर हो चुके मंदिरों और उन सूने पड़े मोहल्लों का दौरा किया, जो कभी उनकी समृद्ध सांस्कृतिक पहचान का केंद्र हुआ करते थे। मार्तंड सूर्य मंदिर, खीर भवानी और अनंतनाग के कई ऐतिहासिक व धार्मिक स्थलों पर इस दल ने पूजा-अर्चना भी की।

सबसे अहम बात यह रही कि इस प्रतिनिधिमंडल ने केवल सुरक्षाबलों के साये में वक्त नहीं बिताया, बल्कि घाटी के स्थानीय नागरिक समाज (Civil Society), मुस्लिम पड़ोसियों और प्रशासनिक अधिकारियों के साथ भी मैराथन बैठकें कीं। इसका एकमात्र उद्देश्य यह समझना था कि क्या अब घाटी का सामाजिक ताना-बाना (Social Fabric) पंडितों की सुरक्षित और स्थायी वापसी के लिए मानसिक रूप से तैयार है या नहीं?

बदलता कश्मीर और मनोवैज्ञानिक सुरक्षा
एक राजनीतिक और रणनीतिक विश्लेषक के तौर पर इस यात्रा का मूल्यांकन किया जाए, तो यह दौरा ऐसे समय में हुआ है जब घाटी ने अनुच्छेद 370 के हटने के बाद एक लंबा और जटिल सफर तय कर लिया है। 2026 का कश्मीर 1990 या 2019 के कश्मीर से काफी अलग है। पत्थरबाजी की घटनाएं अब इतिहास बन चुकी हैं और आतंकी नेटवर्क की कमर काफी हद तक तोड़ी जा चुकी है।

लेकिन, वापसी की डगर पर सबसे बड़ा सवाल ‘सुरक्षा ग्रिड’ से ज़्यादा ‘मनोवैज्ञानिक सुरक्षा’ (Psychological Security) का है। पिछले कुछ सालों में जो छिटपुट ‘टारगेटेड किलिंग्स’ (Targeted Killings) हुई थीं, उसने पंडितों के मन में जो नया खौफ पैदा किया था, उसे जड़ से निकालना प्रशासन के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। जब तक एक आम कश्मीरी पंडित को बिना सुरक्षा गार्ड के श्रीनगर के लाल चौक या सोपोर के बाजारों में बेखौफ घूमने का भरोसा नहीं मिलता, तब तक यह वापसी अधूरी रहेगी।

वापसी की राह में कांटे और सरकार का इम्तिहान
पंडितों का यह 6 दिवसीय दौरा इस बात का स्पष्ट और मजबूत संकेत है कि समुदाय अब ‘रिफ्यूजी कैंपों’ या देश के अन्य महानगरों से वापस अपनी जड़ों की ओर लौटना चाहता है। लेकिन यह वापसी केवल भावुकता या सियासी नारों के आधार पर नहीं हो सकती। इसके लिए एक ठोस ‘इकोनॉमिक और सिक्योरिटी ब्लूप्रिंट’ की दरकार है।

जो पुश्तैनी संपत्तियां 36 साल पहले दहशत के साये में औने-पौने दामों में छिन गई थीं या जिन पर आज अवैध कब्जे हैं, उनका कानूनी निपटारा कैसे होगा? क्या पंडितों के लिए अलग और सुरक्षित ‘स्मार्ट टाउनशिप’ बनाई जाएगी, या उन्हें उनके पुराने पड़ोस में बसाया जाएगा? ये वो ज्वलंत सवाल हैं जिनका जवाब अब सरकार को देना है।

यह 6 दिवसीय दौरा एक नई शुरुआत जरूर है, लेकिन कश्मीरी पंडितों की वापसी सिर्फ एक समुदाय का अपने घरों में लौटना नहीं है। यह भारत के धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक मूल्यों की कश्मीर घाटी में असली ‘पुनर्स्थापना’ (Restoration) होगी। अब गेंद केंद्र सरकार और जम्मू-कश्मीर प्रशासन के पाले में है कि वे इस जगी हुई उम्मीद को एक सुरक्षित और स्थायी हकीकत में कैसे बदलते हैं। अगर यह वापसी सफल होती है, तो यह भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा ‘हीलिंग टच’ (Healing Touch) साबित होगा।