राम मंदिर दान विवाद में बड़ा भूचाल: चंपत राय और अनिल मिश्रा का इस्तीफा मंजूर, कृष्ण मोहन बने नए अंतरिम महासचिव

अभिषेक सिंह/ अयोध्या: राम जन्मभूमि मंदिर के दानपात्रों में करोड़ों रुपये की कथित हेराफेरी और अनियमितताओं के विवाद ने अब एक बड़ा प्रशासनिक और ढांचागत रूप ले लिया है। श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने इस पूरे मामले में सख्त कदम उठाते हुए ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और प्रमुख ट्रस्टी अनिल मिश्रा के इस्तीफे को आधिकारिक रूप से स्वीकार कर लिया है। इसके साथ ही प्रशासनिक व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए आरएसएस के वरिष्ठ नेता और पूर्व आईएफएस (IFS) अधिकारी कृष्ण मोहन को ट्रस्ट का नया अंतरिम महासचिव नियुक्त किया गया है।
आपातकालीन बैठक और कड़े फैसले
अयोध्या स्थित राम जन्मभूमि परिसर में ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास की अध्यक्षता में तीन घंटे तक चली एक आपातकालीन और उच्च स्तरीय बैठक में ये अहम फैसले लिए गए। इस बैठक में ट्रस्ट के 9 स्थायी सदस्यों में से 7 उपस्थित थे, जबकि चंपत राय और अनिल मिश्रा इसमें शामिल नहीं हुए। बैठक के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल (SIT) की प्रारंभिक रिपोर्ट, मीडिया में आ रही खबरों और दान की गिनती में हुई अनियमितताओं की विस्तार से समीक्षा की गई। इसके अतिरिक्त, गोपाल राव को भी विशेष आमंत्रित सदस्यों की सूची से तत्काल प्रभाव से हटा दिया गया है।
582 करोड़ का चंदा और ऑडिट
ट्रस्ट की ओर से जारी आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति में पारदर्शिता का दावा करते हुए बताया गया कि 31 मार्च 2026 तक मंदिर को 582 करोड़ रुपये का नकद और डिजिटल दान प्राप्त हुआ था। इसमें से 391 करोड़ रुपये मंदिर के निर्माण और अन्य संचालन खर्चों में उपयोग किए जा चुके हैं, जबकि शेष राशि बैंक खातों में पूरी तरह सुरक्षित है। ट्रस्ट ने स्पष्ट किया कि 2,900 से अधिक गैर-नकद (सोने-चांदी आदि) दान का पूरा रिकॉर्ड रखा गया है, जिसका हर साल एक स्वतंत्र चार्टर्ड अकाउंटेंट फर्म द्वारा ऑडिट किया जाता है।
चंपत राय का बचाव और आगे की राह
ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद देव गिरि महाराज ने स्पष्ट किया कि चंपत राय ने स्वयं अपने पद से इस्तीफा देने का फैसला किया था, ताकि जांच पूरी होने तक किसी भी तरह के पक्षपात का आरोप न लगे। उन्होंने चंपत राय के जीवन भर के त्याग और मंदिर निर्माण में उनके योगदान की सराहना की। इसके साथ ही, ट्रस्ट ने मंदिर के कुशल प्रबंधन के लिए एक मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) की नियुक्ति के लिए तीन सदस्यीय चयन समिति का भी गठन किया है, जिसमें पूर्व सैन्य और न्यायिक अधिकारी शामिल हैं। यह कदम यह सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है कि भविष्य में मंदिर के प्रबंधन और दान की शुचिता पर कोई आंच न आए।