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डिजिटल इंडिया की वैश्विक कामयाबी: भारत के ‘यूपीआई’ (UPI) सिस्टम को अब तक दुनिया के 12 देशों ने पूरी तरह से अपनाया या इंटीग्रेट किया

विवेक ओझा/ नई दिल्ली:  भारत की ‘डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर’ (DPI) की सफलता अब देश की सीमाओं को पार कर पूरी दुनिया में अपनी धाक जमा रही है। वित्त मंत्रालय और नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) द्वारा जारी किए गए नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, भारत के क्रांतिकारी ‘यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस’ (UPI) को अब तक दुनिया के 12 देशों ने पूरी तरह से अपना लिया है या अपने घरेलू भुगतान प्रणालियों के साथ सफलतापूर्वक इंटीग्रेट (Integrate) कर लिया है। यह भारत के ‘डिजिटल इंडिया’ विजन के लिए एक बहुत बड़ी कूटनीतिक और आर्थिक जीत है।

किन देशों में चल रहा है यूपीआई?

NPCI के इंटरनेशनल विंग (NIPL) के अनुसार, कंबोडिया यूपीआई को अपनाने वाला नवीनतम देश बन गया है। इससे पहले फ्रांस, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), सिंगापुर, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, मॉरीशस, कतर, ग्रीस और कुछ अन्य प्रमुख देश इस सूची में शामिल हो चुके हैं। इन देशों में अब भारतीय पर्यटक, छात्र और व्यवसायी अपने भारतीय बैंक खातों से सीधे रुपये में भुगतान करने के लिए भीम (BHIM), फोनपे (PhonePe) या गूगल पे (Google Pay) जैसे यूपीआई ऐप्स का उपयोग कर सकते हैं। उन्हें भारी ‘फॉरेक्स मार्कअप फीस’ (मुद्रा परिवर्तन शुल्क) देने की आवश्यकता नहीं है।

वित्त वर्ष 2026 में रिकॉर्ड ट्रांजैक्शन

यूपीआई न केवल विदेशों में बल्कि घरेलू मोर्चे पर भी रिकॉर्ड तोड़ रहा है। वित्त मंत्रालय के अनुसार, जून 2026 तक यूपीआई प्लेटफॉर्म पर 55.49 करोड़ से अधिक सक्रिय यूजर्स (Active Users) जुड़ चुके हैं। अकेले वित्त वर्ष 2025-26 (FY26) के दौरान यूपीआई के माध्यम से 314.23 लाख करोड़ रुपये (लगभग 3.56 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर) मूल्य के 24,161 करोड़ से अधिक लेनदेन (Transactions) किए गए, जो दुनिया के किसी भी रियल-टाइम पेमेंट सिस्टम से कहीं अधिक है।

सुरक्षा और वैश्विक वित्तीय समावेश

इस प्रणाली को हैकर्स और साइबर ठगों से सुरक्षित रखने के लिए आरबीआई (RBI) और एनपीसीआई ने ‘कम्प्रिहेंसिव यूपीआई इंफॉर्मेशन सिक्योरिटी फ्रेमवर्क 2025’ लागू किया है, जो ट्रांजैक्शन को और अधिक सुरक्षित बनाता है। वैश्विक स्तर पर यूपीआई की इस स्वीकार्यता से ‘क्रॉस-बॉर्डर रेमिटेंस’ (विदेशों से पैसे भेजना) भी बेहद सस्ता और तेज हो गया है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यूपीआई जैसी स्वदेशी तकनीकें वैश्विक फिनटेक (FinTech) स्पेस में पश्चिमी देशों (जैसे वीज़ा और मास्टरकार्ड) के एकाधिकार को चुनौती दे रही हैं और भारत को एक ‘ग्लोबल टेक-लीडर’ के रूप में स्थापित कर रही हैं।