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जानिए भारत की पहली महिला विधायक और पहली महिला सर्जन मुथुलक्ष्मी रेड्डी

नई दिल्ली ( विवेक ओझा) : देश के सभ्यता और संस्कृति को जीवंत रखने के लिए भारतीय ऐतिहासिक जननायिकाओं की भूमिका जानने में रुचि रखना एक वांछनीय कार्य है । मुथुलक्ष्मी रेड्डी जैसी महान जननायिका जिनका जीवन मूल्य , कर्म , व्यक्तित्व दुर्लभ है और जो हैं इस देश की वैचारिक धरोहर हैं , उनके बहुआयामी व्यक्तित्व के बारे में देश की वर्तमान पीढ़ी को जानना चाहिए। हर सक्षम व्यक्ति के मन में ये होता है कि वो कोई ऐसा काम करे जिसके बारे में इतिहास में जाना जाए कि ये काम पहली बार उसी के द्वारा किया गया था । वो उसका प्रणेता है लेकिन ये कोई नहीं जानता कि कब और कैसे उसे ये खिताब मिल जाएगा। देश समाज में पहली बार किसी काम करने , चिंतन या विचार देने का श्रेय हासिल कर लेना किसी पूर्वनिर्धारित योजना के जरिए संभव नहीं है । नहीं तो हर कोई आज किसी ना किसी विचार , चिंतन , भूमिका का प्रणेता माना जाता। वास्तव में ऐसे किसी भी श्रेय के लिए जो सबसे बड़ी चीज जिम्मेदार है वह है व्यक्ति की अपनी वो मूल नैसर्गिक प्रवृत्ति जिसके अनुसार काम करने के लिए इंसान के मन में एक छटपटाहट होती है। मूल नैसर्गिक प्रवृत्ति ही किसी इंसान को उसके लायक नवाचार और रचनाधर्मिता से जोड़ती है , सक्रिय और गतिशील मकसद देती है जैसा मुथुलक्ष्मी रेड्डी को मिला । अपनी अंतर्निहित और अर्जित सक्षमता , कौशल का सही और प्रासंगिक एक्जीक्यूशन करना ही वो मार्ग है जो किसी को प्रणेता का खिताब दिला सकता है , जैसा मुथुलक्ष्मी रेड्डी के साथ हुआ ।

मुथुलक्ष्मी रेड्डी भारत की पहली महिला विधायक होने के साथ साथ देश की पहली महिला सर्जन भी थीं। वह 1912 में देश की पहली मेडिकल ग्रेजुएट बनी जिन्होंने स्वास्थ्य संबंधी एक नई सोच भारतीय जनमानस को ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन काल के दौरान दी । महान शिक्षाविद् और समाज सुधारक रहीं मुथुलक्ष्मी रेड्डी की आज बर्थ एनिवर्सरी है। 30 जुलाई 1886 को तमिलनाडु में जन्मी मुथुलक्ष्मी मद्रास मेडिकल कॉलेज में प्रवेश लेने वाली पहली महिला छात्रा बनीं थीं। मुथुलक्ष्मी ही लड़कों के स्कूल में दाखिला लेने वालीं देश की पहली महिला थीं। इन्होंने मद्रास विधानसभा में काम करते हुए शादी के लिए तय उम्र को बढ़ाने की मांग की। 1927 में मद्रास लेजिस्लेटिव काउंसिल से देश की पहली महिला विधायक बनने का गौरव इन्हें ही हासिल हुआ।

पुदुक्कोटाई , तमिलनाडु में जन्मी इस महिला ने अपने आस पास सामाजिक रूप से विकलांग व्यवस्था को पाया । बाल विवाह का जादू सर चढ़ कर बोल रहा था , देवदासी प्रथा का भी बोल बाला था , ऐसे में अपने को शिक्षित कर अपने समाज को एक बड़ा संदेश देने की ठानी।पुदुक्कोटाई के राजा मार्तण्ड भैरवा थोंडामन ने सारे रूढ़ि रिवाजों और विरोधों को दरकिनार करते हुए उन्हें पढ़ने की अनुमति दी थी।

इस महान महिला की भूमिका की का आंकलन करते बनता है । स्त्री धर्म नामक पत्रिका की संपादक , 1935 तक ऑल एशियन कॉन्फ्रेंस ऑफ वूमेन की चेयरमैन , चिल्ड्रेन एड सोसायटी की पहली एक्टिव ऑनरेरी सेक्रेटरी और ऑर्गनाइजर , 1918 में गठित वूमेंस इंडियन एसोसिएशन की संस्थापक सदस्य , मुस्लिम लड़कियों के लिए पृथक हॉस्टल का निर्माण , हरिजन गर्ल्स इंस्टीट्यूट को छात्रवृत्ति प्रदाता की भूमिका , विवाह की न्यूनतम आयु कम से कम 21 वर्ष करने , एंटी पोलिगैमी बिल को ले आने वाली , कस्तूरबा हॉस्पिटल में अपनी सेवा देने वाली , 1926 में पेरिस में इंटरनेशनल कांग्रेस ऑफ वूमेन में भारतीय प्रतिनिधिमंडल के सदस्य के रूप में सहभाग आदि ना जाने ऐसी ही कितनी भूमिकाएं थीं जिनका मुथुलक्ष्मी रेड्डी ने बखूबी निर्वहन किया था ।

कितना रोमांचक होता है दुर्लभ का सुलभ हो जाना, सामान्य का विशिष्ट और क्षण का इतिहास बन जाना। इतिहास के शिखर धरातल पर ऐसे भी अनेक अनदेखे अनजाने अनसुने अचर्चित जीवननायक ) नायिकाएं होते/होती हैं जिनकी महानता का संज्ञान होते ही हम हतप्रभ हो जाते हैं ।

एक ऐसी महिला जिन्हें नेशनलिस्ट वूमेंस ऑर्गनाइजेशन ऑफ इंडिया द्वारा 1930 में लंदन में तीसरे गोलमेज सम्मेलन में भारतीय महिलाओं का प्रतिनिधित्व करने के लिए नामांकित किया गया था। एक ऐसी नेतृत्वकर्ता जिन्हें 1932 में शिकागो में वर्ल्ड वूमेंस कांग्रेस में भारतीय महिलाओं के प्रतिनिधित्व के लिए मनोनीत किया गया था। एक ऐसी विधि निर्माता व्यक्तित्व की स्वामिनी जिन्हें इसी समयावधि में वायसराय ने सर फिलिप हार्टोग एजुकेशन कमीशन में मनोनीत किया जो भारत और बर्मा शैक्षणिक प्रोजेक्ट्स की समीक्षा से संबंधित था । इससे भी बड़ी भूमिका की बात करें तो 1930 में गांधी जी द्वारा नमक सत्याग्रह की शुरुआत के साथ ही मुथुलक्ष्मी ने मद्रास विधान परिषद और उपसभापति के पद से इस्तीफा दे दिया था।

बाल विवाह का मुथुलक्ष्मी ने पुरजोर विरोध किया और अपने माता-पिता को उन्हें शिक्षित करने के लिए राजी किया। बच्चियों के साथ होने वाले उत्पीड़न के ख़िलाफ़ भी उन्होंने आवाज़ बुलंद की थी। मुथुलक्ष्मी में एक महान महिला अधिकार कार्यकर्ता और स्वतंत्रता सेनानी सक्रिय था। इन्हें अपनी मेडिकल ट्रेनिंग के दौरान एक बार कांग्रेस नेता सरोजिनी नायडू से मिलने का मौका मिला। बस यहीं से उन्होंने महिलाओं के अधिकारों और देश की आज़ादी के लिए लड़ने की कसम खा ली। यहां तक कि उन्हें इंग्लैंड जाकर आगे पढ़ने का मौका भी मिला लेकिन उन्होंने इसे छोड़कर वूमेंस इंडियन असोसिएशन के लिए काम करना ज्यादा ज़रूरी समझा।

साल 1954 में ‘अड्यार कैंसर इंस्टिट्यूट’ बनवाकर उन्होंने समाज को वरदान दिया। आज यहां साल भर में 80 हजार से अधिक कैंसर मरीजों का इलाज होता है। उनके इस योगदान को ध्यान में रखते हुए साल 1956 में समाज के लिए किये गए उनके कार्यों के लिए उन्हें पद्म भूषण अवार्ड से सम्मानित किया गया और तमिलनाडु सरकार उनकी याद में 30 जुलाई को ‘हॉस्पिटल डे’ के तौर पर मनाने का निर्णय भी कर चुकी है। ए पॉयनियर वूमेन लेजिस्लेटर उनकी आत्मकथा है जो 1964 में प्रकाशित हुई थी जिसमें उन्होंने अपने बारे में काफी कुछ बताया है । उन्होंने अपनी एक अन्य पुस्तक माय एक्सपीरिएंस ऐज ए लेजिस्लेटर में अपने अनुभवों और कार्यप्रणाली के बारे में बताया है।

22 जुलाई को हर साल उनकी पुण्यतिथि मनाई जाती है। ऐसी महान गुणों से सुसज्जित महिला का पावन स्मरण करते रहना जरूरी है जिससे हम सभी अपनी जिम्मेदारियों से एक नए उर्जित भाव से जुड़ सकें।

ऐसे लोग हमेशा उदाहरण बनते रहे हैं जिन्होंने कड़वे, तूफानी दौर की परवाह किये बिना प्रबुद्ध , पवित्र , सार्थक , रोचक, वैध जीवन जिया और जनजीवन को लाभान्वित किया। इतिहास इन फूलों की, इनकी खुशबू की स्वतः रक्षा करता है क्योंकि ये जीवन के उद्देश्य के रक्षक, पहरेदार होते हैं।

जो पुरस्कार, प्रशंसा, प्रोत्साहन के ईंधन की वजह बन गए उन नींव के ईटों के प्रति हम सभी कृतज्ञ है। सृष्टि के महान प्रयोजन में जीवन नायक अथवा महापुरुष अंखड मानव सम्पदा है। वे अविभाज्य श्रद्धा हैं।