‘एथिकल हैकिंग’ बनाम अपराध: सुप्रीम कोर्ट ने अनधिकृत नेटवर्क एक्सेस मामले में साइबर-सुरक्षा शोधकर्ता को दी अंतरिम ज़मानत
सरिता त्रिपाठी/ नई दिल्ली: भारत की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) ने तकनीकी और कानूनी जगत के एक बेहद संवेदनशील मामले में अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने कंप्यूटर नेटवर्क तक अनधिकृत पहुंच (Unauthorized Access) के आरोप में गिरफ्तार किए गए एक जाने-माने साइबर-सुरक्षा शोधकर्ता (Cyber-security researcher) को अंतरिम ज़मानत दे दी है। यह मामला ‘एथिकल हैकिंग’ (Ethical Hacking) और साइबर अपराध के बीच की पतली और धुंधली रेखा को लेकर एक बड़ी राष्ट्रीय बहस को जन्म दे रहा है।
मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, उक्त शोधकर्ता ने एक बड़े सरकारी या कॉर्पोरेट नेटवर्क में मौजूद एक गंभीर सुरक्षा खामी (Vulnerability) को उजागर किया था। शोधकर्ता का दावा है कि उसने यह काम केवल सिस्टम की खामियों को उजागर करने (White-hat hacking) और संबंधित संस्था को सचेत करने के इरादे से किया था, ताकि भविष्य में कोई दुर्भावनापूर्ण हैकर (Black-hat hacker) उसका गलत फायदा न उठा सके। हालांकि, संबंधित संस्था ने खामी को सुधारने के बजाय शोधकर्ता पर ही आईटी अधिनियम (IT Act) की कठोर धाराओं के तहत ‘डेटा चोरी’ और ‘सिस्टम में घुसपैठ’ का मुकदमा दर्ज करा दिया।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान, बचाव पक्ष के वकीलों ने तर्क दिया कि यदि साइबर सुरक्षा शोधकर्ताओं को सिस्टम की खामियां खोजने पर जेल में डाल दिया जाएगा, तो भारत का डिजिटल ढांचा कभी भी सुरक्षित नहीं हो पाएगा। मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने मामले की गंभीरता और शोधकर्ता की मंशा (Mens Rea) को ध्यान में रखते हुए उसे अंतरिम राहत प्रदान की। साइबर कानून (Cyber Law) के विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को ऐसे स्पष्ट कानूनों और नीतियों की सख्त आवश्यकता है जो ‘बग बाउंटी’ (Bug Bounty) कार्यक्रमों को बढ़ावा दें और नेक इरादे से काम करने वाले तकनीकी शोधकर्ताओं को कानूनी संरक्षण प्रदान करें, ताकि डिजिटल इंडिया का सपना सुरक्षित रूप से साकार हो सके।