बीजिंग का नवाचार तंत्र: चीन के ‘मार्केट-स्टेट हाइब्रिड मॉडल’ से दुनिया के लिए बड़े सबक, कैसे राज्य और बाज़ार ने मिलकर गढ़ा आर्थिक वर्चस्व
विवेक ओझा/ बीजिंग / नई दिल्ली: वैश्विक अर्थव्यवस्था और भू-राजनीति में चीन की तकनीकी और आर्थिक प्रगति लंबे समय से शोध का विषय रही है। हाल ही में, बीजिंग के नवाचार (Innovation) के तरीके और उसके अनूठे ‘मार्केट-स्टेट हाइब्रिड मॉडल’ (Market-State Hybrid Model) से सीखे जा सकने वाले सबकों पर एक गहरी विश्लेषणात्मक बहस छिड़ी है। यह मॉडल प्रतियोगी परीक्षाओं के छात्रों के लिए ‘अंतरराष्ट्रीय अर्थशास्त्र’ (International Economics) को समझने के लिहाज़ से एक शानदार केस स्टडी है।
जब दुनिया 1990 के दशक में मान रही थी कि मुक्त बाज़ार (Free Market) और लोकतंत्र एक साथ चलते हैं, तब चीन ने एक बिल्कुल अलग रास्ता चुना। ‘मार्केट-स्टेट हाइब्रिड मॉडल’ का अर्थ है एक ऐसी व्यवस्था जहाँ सरकार (State) का कठोर केंद्रीय नियंत्रण और पूंजीवादी बाज़ार (Market Capitalism) की प्रतिस्पर्धा एक साथ मौजूद होते हैं। इस मॉडल में कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) देश के रणनीतिक लक्ष्यों (जैसे AI, इलेक्ट्रिक व्हीकल, सेमीकंडक्टर) को तय करती है और राज्य के स्वामित्व वाले बैंकों के माध्यम से भारी-भरकम सब्सिडी मुहैया कराती है।
लेकिन, उत्पादन और नवाचार का काम निजी क्षेत्र की कंपनियों (जैसे BYD, Huawei, Tencent) पर छोड़ दिया जाता है, जिन्हें बाज़ार में जीवित रहने के लिए आपस में गलाकाट प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है। यह राज्य के संरक्षण और मुक्त बाज़ार की गतिशीलता का एक घातक और सफल संयोजन है।
चीन ने इसी मॉडल के दम पर सोलर पैनल और इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) के वैश्विक बाज़ार पर एकाधिकार जमा लिया है। भारत और अन्य विकासशील देशों के लिए यहाँ एक बड़ा आर्थिक सबक है। यद्यपि भारत एक लोकतांत्रिक देश है और वह चीन के एकाधिकारवादी ढांचे की नकल नहीं कर सकता, लेकिन रणनीतिक क्षेत्रों में ‘सरकार की नीतियों के समर्थन’ और ‘निजी क्षेत्र के नवाचार’ के बीच बेहतर तालमेल बिठाने (जैसे भारत का PLI स्कीम) की आवश्यकता है। चीन का यह हाइब्रिड मॉडल यह साबित करता है कि नवाचार केवल पश्चिमी शैली के पूंजीवाद की बपौती नहीं है।