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केन-बेतवा लिंक परियोजना पर प्रदर्शन: केंद्र सरकार ने विस्थापितों के मुद्दे राज्य सरकारों पर क्यों छोड़े?

राघवेंद्र प्रताप सिंह/ नई दिल्ली / भोपाल: भारत की पहली और बहुचर्चित नदी जोड़ो परियोजना ‘केन-बेतवा लिंक परियोजना’ (Ken-Betwa Link Project) एक बार फिर विवादों में है। इस मेगा प्रोजेक्ट के कारण विस्थापित होने वाले आदिवासियों और पर्यावरणविदों द्वारा किए जा रहे भारी प्रदर्शनों के बीच केंद्र सरकार ने एक रणनीतिक कदम उठाया है। एक विश्लेषणात्मक रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि क्यों केंद्र सरकार केन-बेतवा प्रदर्शनकारियों द्वारा उठाए गए मुद्दों को राज्य सरकारों के पाले में डाल रही है।

इस 44,000 करोड़ रुपये की परियोजना का मुख्य उद्देश्य मध्य प्रदेश की केन नदी के अधिशेष पानी को उत्तर प्रदेश की बेतवा नदी में स्थानांतरित कर बुंदेलखंड के सूखाग्रस्त इलाकों को हरा-भरा करना है। लेकिन, इसके कारण पन्ना टाइगर रिज़र्व का एक बड़ा हिस्सा डूब क्षेत्र में आ रहा है और हज़ारों स्थानीय निवासियों को अपनी ज़मीन छोड़नी पड़ रही है। प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांग उचित मुआवज़ा और पुनर्वास है।

केंद्र सरकार द्वारा इन मुद्दों को सीधे संबोधित करने के बजाय राज्य सरकारों (मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश) पर टालने के पीछे मुख्य तर्क यह है कि ‘भूमि अधिग्रहण’ और ‘पुनर्वास’ मुख्य रूप से राज्य सूची के विषय हैं। केंद्र का मानना है कि ज़मीनी स्तर पर मुआवज़ा बांटने और लोगों को दूसरी जगह बसाने की प्रशासनिक मशीनरी राज्यों के पास है। इसके अलावा, इस रणनीति के ज़रिए केंद्र सरकार परियोजना में होने वाली देरी या स्थानीय असंतोष का सीधा राजनीतिक दोष अपने सिर लेने से बचना चाहती है। हालांकि, विस्थापितों का कहना है कि परियोजना के लिए जब फंड और मंज़ूरी केंद्र से आई है, तो उनकी ज़िम्मेदारी भी केंद्र को ही लेनी चाहिए।