रक्षा आधुनिकीकरण में नई उड़ान की तैयारी
संसदीय पैनल ने फ्रांस की 'फाइटर जेट परियोजना' में भारत के शामिल होने पर सरकार से मांगा विस्तृत रोडमैप
इंडियन व्यू टीम/ नई दिल्ली: भारतीय वायुसेना (IAF) की घटती स्क्वाड्रन ताकत और वायु रक्षा को अभेद्य बनाने की दिशा में रक्षा मामलों की संसदीय स्थायी समिति (Parliamentary Standing Committee on Defence) ने सरकार से एक अहम जवाब तलब किया है। समिति ने रक्षा मंत्रालय से फ्रांस की ‘भविष्य की लड़ाकू विमान परियोजना’ (French Fighter Project) में भारत के संभावित रूप से शामिल होने या किसी भी तरह के संयुक्त विकास (Joint Development) कार्यक्रम को लेकर एक स्पष्ट ‘रोडमैप’ (Roadmap) की मांग की है।
यह मांग ऐसे समय में उठी है जब भारत और फ्रांस के बीच रक्षा और रणनीतिक संबंध अपने चरम पर हैं। भारत पहले ही फ्रांस से राफेल (Rafale) लड़ाकू विमान खरीद चुका है और नौसेना के लिए ‘राफेल-एम’ (Rafale-M) के सौदे पर भी बातचीत चल रही है। संसदीय पैनल का ध्यान अब भविष्य की तकनीकी आत्मनिर्भरता पर है। पैनल जानना चाहता है कि क्या भारत केवल एक ‘खरीदार’ (Buyer) बना रहेगा, या फ्रांस के साथ मिलकर 5वीं या 6ठी पीढ़ी के उन्नत लड़ाकू विमानों, उनके जटिल एवियोनिक्स और विशेष रूप से स्वदेशी लड़ाकू इंजनों (Fighter Engines – Safran collaboration) के निर्माण में सह-भागीदार (Co-developer) बनेगा।
संसदीय समिति की रिपोर्ट में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि चीन जिस तेज़ी से अपनी वायु सेना का आधुनिकीकरण (Modernization) कर रहा है और जे-20 (J-20) जैसे स्टील्थ विमानों की तैनाती कर रहा है, उसे देखते हुए भारत को भी अपनी उन्नत मध्यम लड़ाकू विमान (AMCA) परियोजना में तेज़ी लानी होगी।
डिफेंस टेक्नोलॉजी के जानकारों का मानना है कि फ्रांस के साथ ‘टेक्नोलॉजी ट्रांसफर’ (Transfer of Technology – ToT) समझौते के तहत इंजन और रडार तकनीक हासिल करना भारत के ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान के लिए एक बड़ा गेम-चेंजर साबित हो सकता है। संसदीय समिति का यह हस्तक्षेप रक्षा मंत्रालय पर इस बात का दबाव बनाएगा कि वह लालफीताशाही (Red-tapism) को दूर कर विदेशी रक्षा सौदों और स्वदेशी निर्माण के बीच एक ठोस और समयबद्ध रणनीति तैयार करे, ताकि भारत की सामरिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) सुनिश्चित की जा सके।