बेंगलुरु में संवेदनहीनता और सामाजिक एकाकीपन की दर्दनाक तस्वीर
घर के भीतर मिला 57 वर्षीय महिला का कंकाल, 1 साल तक किसी को नहीं हुई भनक
अभिषेक सिंह/ बेंगलुरु: देश की टेक राजधानी कहे जाने वाले बेंगलुरु शहर से एक बेहद दर्दनाक, विचलित करने वाली और सामाजिक ताने-बाने पर गंभीर सवाल उठाने वाली खबर सामने आई है। बेंगलुरु के हवेनूर लेआउट (Havanur Layout) इलाके में स्थित एक मकान के भीतर 57 वर्षीय महिला का कंकाल मिला है। पुलिस जांच और फॉरेंसिक रिपोर्ट के अनुसार, महिला की मृत्यु लगभग एक वर्ष पहले हो चुकी थी, लेकिन पूरे एक साल तक न तो पड़ोसियों को इसकी भनक लगी और न ही किसी रिश्तेदार ने उनकी सुध ली। इस घटना ने आधुनिक शहरी जीवन में तेज़ी से बढ़ रहे सामाजिक एकाकीपन (Urban Isolation) के भयानक रूप को उजागर कर दिया है।
पुलिस से मिली आधिकारिक जानकारी के अनुसार, मृतका की पहचान 57 वर्षीय दक्षायिनी (Dakshayini) के रूप में हुई है। पड़ोसियों और स्थानीय पुलिस से मिली जानकारी के मुताबिक, वर्ष 2005 में अपने इकलौते बेटे की असमय मृत्यु के बाद दक्षायिनी गहरे मानसिक आघात में चली गई थीं और वे पिछले कई सालों से ‘सिज़ोफ्रेनिया’ (Schizophrenia) नामक गंभीर मानसिक बीमारी से जूझ रही थीं। वे अपने मकान में अकेली रहती थीं और बाहरी दुनिया व पड़ोसियों से उनका संपर्क पूरी तरह से कटा हुआ था।
एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि पिछले लगभग एक साल के दौरान पड़ोसियों को न तो घर से किसी तरह की बदबू महसूस हुई और न ही महिला की इतने लंबे समय से गैरमौजूदगी पर किसी को कोई शक हुआ। इसी लापरवाही और संवादहीनता के कारण उनकी मौत की खबर पुलिस तक नहीं पहुंच सकी। शुक्रवार (7 अगस्त 2026) को जब पुलिस टीम किसी प्रक्रिया के तहत वहां पहुंची और दरवाजा तोड़ा, तो अंदर का दृश्य देखकर सभी सन्न रह गए।
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों और समाजशास्त्रियों का मानना है कि यह घटना केवल एक अपराध या दुर्घटना नहीं है, बल्कि यह हमारे आधुनिक शहरी समाज की उस भयावह स्थिति का आईना है जहाँ बहुमंजिला इमारतों और घनी बस्तियों में रहने के बावजूद लोग एक-दूसरे से पूरी तरह बेखबर हैं। विशेष रूप से अकेले रहने वाले वृद्धों और मानसिक रूप से बीमार व्यक्तियों की देखभाल के लिए कोई सामाजिक सुरक्षा चक्र (Social Security Net) मौजूद नहीं है। इस घटना के बाद स्थानीय प्रशासन और नागरिक समूहों से यह मांग की जा रही है कि अकेले रहने वाले बुजुर्गों और मरीजों का एक आधिकारिक डेटाबेस बनाया जाए और समय-समय पर उनकी स्थिति का जायज़ा लेने के लिए कम्युनिटी वॉलंटियर्स तैनात किए जाएं, ताकि किसी भी नागरिक का ऐसा दर्दनाक अंत न हो।