अमेरिकी टैरिफ धमकियों के बावजूद भारत का कूटनीतिक मास्टरस्ट्रोक
तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 48% के सर्वकालिक उच्चतम स्तर पर
अभिषेक सिंह/नई दिल्ली: अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) के मोर्चे पर भारत ने एक बार फिर अपनी ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ (Strategic Autonomy) का कड़ा और स्पष्ट प्रमाण दिया है। ताज़ा आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भारत के कुल कच्चे तेल (Crude Oil) आयात में रूस की हिस्सेदारी उछलकर 48 प्रतिशत के सर्वकालिक उच्च स्तर (All-time high) पर पहुंच गई है। यह ऐतिहासिक आंकड़ा ऐसे समय में सामने आया है जब संयुक्त राज्य अमेरिका (US) ने रूसी व्यापार को लेकर भारत पर 100% तक के कड़े टैरिफ (Tariffs) लगाने की खुली धमकी दी थी।
आर्थिक विश्लेषकों और कूटनीतिक जानकारों के लिए यह एक बेहद अहम घटनाक्रम है। रूस-यूक्रेन युद्ध की शुरुआत से पहले, भारत के कुल तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी बमुश्किल 1 से 2 प्रतिशत हुआ करती थी। भारत अपनी ऊर्जा ज़रूरतों के लिए मुख्य रूप से इराक, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे मध्य पूर्वी देशों पर निर्भर था। लेकिन पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर लगाए गए कड़े आर्थिक प्रतिबंधों के बाद, रूस ने भारत को भारी डिस्काउंट (छूट) पर कच्चा तेल देना शुरू किया। भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों और घरेलू बाज़ार में पेट्रोल-डीजल की महंगाई को नियंत्रित करने के लिए इस अवसर का भरपूर लाभ उठाया।
अमेरिका और यूरोपीय संघ का लगातार दबाव रहा है कि भारत रूस से तेल खरीदना बंद करे। हाल ही में अमेरिकी प्रशासन ने चेतावनी दी थी कि जो देश रूसी ऊर्जा का आयात बढ़ाएंगे, उन पर 100% दंडात्मक टैरिफ लगाए जा सकते हैं। हालांकि, भारतीय विदेश मंत्रालय ने हमेशा यह स्पष्ट किया है कि भारत की ऊर्जा नीतियां केवल और केवल भारतीय नागरिकों के हितों द्वारा निर्देशित होती हैं, किसी बाहरी दबाव से नहीं।
अर्थव्यवस्था के दृष्टिकोण से, सस्ते रूसी तेल ने भारत के आयात बिल को अरबों डॉलर कम करने में मदद की है, जिससे भारत का विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) सुरक्षित रहा और चालू खाता घाटा (CAD) नियंत्रण में रहा है। भारत का यह रुख ग्लोबल साउथ (Global South) के लिए एक मिसाल बन गया है कि कैसे महाशक्तियों के दबाव के बीच अपने संप्रभु आर्थिक हितों की रक्षा की जाती है।