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भाषाई अस्मिता और सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक

तमिलनाडु विधानसभा ने 'तमिल थाई वाज़थु' को कार्यक्रमों की शुरुआत में अनिवार्य रूप से गाने का प्रस्ताव किया पारित

अभिषेक सिंह/ चेन्नई: तमिलनाडु की भाषाई अस्मिता, द्रविड़ियन राजनीति और सांस्कृतिक गौरव के दृष्टिकोण से राज्य विधानसभा ने एक बेहद ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किया है। मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने विधानसभा में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव अपनाया है, जिसके तहत अब राज्य भर में आयोजित होने वाले सभी सरकारी, शैक्षणिक और सार्वजनिक कार्यक्रमों की शुरुआत में ‘तमिल थाई वाज़थु’ (Tamil Thai Vazhthu) को अनिवार्य रूप से गाया जाएगा। यह फैसला राज्य की सांस्कृतिक पहचान को और अधिक सुदृढ़ करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

‘तमिल थाई वाज़थु’ मूल रूप से तमिल माता (Mother Tamil) की स्तुति में लिखा गया एक गीत है। इसे प्रसिद्ध तमिल विद्वान मनोनमनियम सुंदरम पिल्लई ने लिखा था। राज्य सरकार ने पहले ही इसे तमिलनाडु के ‘राज्य गान’ (State Anthem) का आधिकारिक दर्जा दे रखा है। नए विधानसभा प्रस्ताव के अनुसार, जब भी यह गीत गाया या बजाया जाएगा, तो दिव्यांगजनों (Differently-abled) को छोड़कर वहां मौजूद सभी लोगों के लिए सम्मान में खड़ा होना अनिवार्य होगा। यह नियम सरकारी कार्यालयों, स्थानीय निकायों, विश्वविद्यालयों और स्कूलों में आयोजित होने वाले सभी समारोहों पर सख्ती से लागू होगा।

राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं है, बल्कि इसके गहरे राजनीतिक निहितार्थ भी हैं। एक ऐसे समय में जब राष्ट्रीय स्तर पर ‘हिंदी थोपने’ (Hindi Imposition) और ‘एक राष्ट्र, एक संस्कृति’ की बहस जोरों पर है, तमिलनाडु सरकार इस प्रस्ताव के ज़रिए स्पष्ट संदेश देना चाहती है कि राज्य अपनी अनूठी भाषाई और सांस्कृतिक पहचान के साथ कोई समझौता नहीं करेगा।

विपक्ष ने भी इस मुद्दे पर सरकार का पूर्ण समर्थन किया है, क्योंकि तमिलनाडु की राजनीति में तमिल भाषा के सम्मान का मुद्दा दलगत राजनीति से बहुत ऊपर है। शिक्षाविदों ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा है कि यह युवा पीढ़ी, विशेषकर स्कूली छात्रों में अपनी मातृभाषा के प्रति सम्मान और जुड़ाव पैदा करेगा। यह प्रस्ताव भारत की विविधता (Diversity) और संघीय ढांचे (Federal Structure) की उस खूबसूरती को भी दर्शाता है, जहाँ क्षेत्रीय अस्मिताएं राष्ट्रीय पहचान के साथ सामंजस्य बिठाकर चलती हैं।