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‘यह सरकार की असहिष्णुता और न्यायपालिका की स्थिति को दर्शाता है’

TISS छात्रों को ज़मानत न मिलने पर कपिल सिब्बल का तीखा प्रहार

राघवेंद्र प्रताप सिंह/ नई दिल्ली / मुंबई: टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) के दो पूर्व छात्रों को अदालत द्वारा ज़मानत (Bail) देने से इनकार किए जाने के बाद देश में अभिव्यक्ति की आज़ादी और न्यायिक प्रणाली की कार्यप्रणाली को लेकर एक बड़ी राजनीतिक और कानूनी बहस छिड़ गई है। देश के जाने-माने वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने इस अदालती फैसले की कड़ी आलोचना करते हुए इसे सीधे तौर पर ‘सरकार की असहिष्णुता’ (Government’s Intolerance) और ‘न्यायपालिका की वर्तमान दयनीय स्थिति’ का परिचायक बताया है।

मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, इन पूर्व छात्रों को कथित तौर पर राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों, भड़काऊ पर्चे बांटने या गैर-कानूनी गतिविधियों (अक्सर UAPA जैसे सख्त कानूनों के तहत) में संलिप्तता के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। सिब्बल और अन्य मानवाधिकार वकीलों का तर्क है कि छात्रों द्वारा असहमति जताना या सरकार की नीतियों का विरोध करना लोकतंत्र का एक अभिन्न अंग है (अनुच्छेद 19 – वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता)। उनका आरोप है कि सरकार असहमति के हर स्वर को ‘देशद्रोह’ या ‘आतंकवाद’ का चोला पहनाकर जेल में डाल रही है।

कपिल सिब्बल ने अपने बयान में न्यायपालिका की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं। भारतीय न्यायशास्त्र (Indian Jurisprudence) का एक स्थापित सिद्धांत है- ‘ज़मानत नियम है, जेल अपवाद’ (Bail is the rule, jail is an exception)। सिब्बल का तर्क है कि निचली अदालतें अक्सर इस सिद्धांत को भूलकर पुलिस और जांच एजेंसियों के नैरेटिव (विमर्श) के दबाव में काम कर रही हैं। छात्रों को महीनों या सालों तक बिना ट्रायल के जेल में रखना उनके मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान विपक्ष के उस व्यापक विमर्श का हिस्सा है, जिसके तहत वे लगातार यह आरोप लगा रहे हैं कि वर्तमान शासन में संवैधानिक संस्थाओं (Constitutional Bodies) को कमज़ोर किया जा रहा है। दूसरी ओर, सत्ता पक्ष और जांच एजेंसियों का बचाव है कि राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोपरि है और शैक्षणिक संस्थानों की आड़ में कट्टरपंथी या अलगाववादी विचारधारा को बढ़ावा देने वालों के साथ सख्ती से निपटना आवश्यक है। यह मामला एक बार फिर राष्ट्रीय सुरक्षा बनाम नागरिक स्वतंत्रता (National Security vs Civil Liberties) की पुरानी बहस को केंद्र में ले आया है।