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स्वास्थ्य क्षेत्र की एक अनदेखी त्रासदी: भारत में ‘हीमोफीलिया’ के निदान में देरी का गंभीर परिणाम है रोकी जा सकने वाली ‘दृष्टि हानि’

राघवेंद्र प्रताप सिंह/नई दिल्ली:भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य परिदृश्य (Public Health Scenario) में आनुवंशिक रक्त विकारों (Genetic Bleeding Disorders) को लेकर एक बेहद गंभीर और अनदेखा पहलू सामने आया है। ‘द हिंदू’ में प्रकाशित एक ताज़ा वैज्ञानिक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में ‘हीमोफीलिया’ (Haemophilia) के निदान (Diagnosis) में होने वाली देरी और जागरूकता की कमी का एक बेहद खौफनाक और अप्रत्याशित परिणाम सामने आ रहा है—और वह है मरीजों की आंखों की रोशनी का जाना (Preventable Vision Loss)।

हीमोफीलिया एक दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी है जिसमें शरीर के रक्त का थक्का (Blood Clot) ठीक से नहीं जमता है। आमतौर पर इस बीमारी को जोड़ों (Joints) या मांसपेशियों में होने वाले आंतरिक रक्तस्राव से जोड़ा जाता है। लेकिन चिकित्सा शोधकर्ताओं ने पाया है कि अगर हीमोफीलिया के मरीजों को समय पर एंटी-हीमोफिलिक फैक्टर (AHF) रिप्लेसमेंट थेरेपी न मिले, तो उनकी आंखों के भीतर (Intraocular) भी रक्तस्राव हो सकता है। यह सूक्ष्म रक्तस्राव धीरे-धीरे रेटिना और ऑप्टिक नर्व को स्थायी रूप से नष्ट कर देता है, जिससे मरीज़ हमेशा के लिए अंधा हो सकता है।

भारत में इस समस्या की जड़ डायग्नोस्टिक गैप (निदान का अंतर) में छिपी है। वर्ल्ड फेडरेशन ऑफ हीमोफीलिया के अनुसार, भारत में हीमोफीलिया के लगभग 80% मामले बिना निदान (Undiagnosed) के ही रह जाते हैं, विशेषकर ग्रामीण इलाकों में, जहाँ न तो जेनेटिक टेस्टिंग की सुविधा है और न ही प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर आवश्यक फैक्टर कंसन्ट्रेट्स (Factor Concentrates) उपलब्ध होते हैं।

जब तक मरीज़ को बीमारी का पता चलता है, तब तक उसकी दृष्टि को अपूरणीय क्षति हो चुकी होती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने सरकार से अपील की है कि नवजात शिशुओं की अनिवार्य जेनेटिक स्क्रीनिंग और ज़िला स्तर पर ‘हीमोफीलिया केयर सेंटर्स’ की स्थापना की जाए। यह रिपोर्ट इस बात पर ज़ोर देती है कि कैसे समय पर किया गया एक छोटा सा क्लिनिकल हस्तक्षेप एक व्यक्ति के जीवन को अंधकारमय होने से बचा सकता है।