बाल मनोविज्ञान की अहम कड़ी: क्या है ‘इमोशनल रेगुलेशन’ और क्यों बच्चों के मानसिक विकास के लिए यह है सबसे ज़रूरी कौशल?
विवेक ओझा/ नई दिल्ली: आधुनिक जीवनशैली, स्क्रीन टाइम की अधिकता और कोविड महामारी के बाद बच्चों के व्यवहार में आ रहे बदलावों के बीच, बाल मनोविज्ञान (Child Psychology) का एक विषय सबसे अधिक चर्चा में है- ‘इमोशनल रेगुलेशन’ (Emotional Regulation)। एक प्रख्यात बाल मनोवैज्ञानिक द्वारा दी गई ताज़ा व्याख्या के अनुसार, यह कौशल न केवल बच्चों के बचपन को संवारता है, बल्कि उनके भविष्य की सफलता और मानसिक स्वास्थ्य की नींव भी रखता है।
सरल शब्दों में, ‘भावनात्मक नियमन’ या इमोशनल रेगुलेशन का अर्थ है अपनी भावनाओं (जैसे गुस्सा, निराशा, उदासी या अत्यधिक खुशी) को पहचानने, समझने और उन पर उचित तरीके से नियंत्रण पाने की क्षमता। जब एक छोटा बच्चा खिलौना न मिलने पर ज़मीन पर लेटकर रोने लगता है (Tantrums), तो इसका अर्थ है कि वह अपनी तीव्र भावनाओं को ‘रेगुलेट’ करना नहीं जानता।
मनोवैज्ञानिकों का स्पष्ट कहना है कि बच्चे इस कौशल के साथ पैदा नहीं होते, बल्कि वे इसे अपने माता-पिता और पर्यावरण को देखकर सीखते हैं। यदि माता-पिता तनाव की स्थिति में चिल्लाते हैं, तो बच्चा भी वही सीखता है। इसके विपरीत, यदि अभिभावक शांत रहकर समस्या का समाधान करते हैं, तो बच्चे का मस्तिष्क भी उसी ‘को-रेगुलेशन’ (Co-regulation) मॉडल को अपना लेता है।
शिक्षाविदों के लिए यह विषय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति’ (NEP 2020) भी छात्रों के ‘समग्र विकास’ (Holistic Development) और ‘सामाजिक-भावनात्मक शिक्षा’ (Social-Emotional Learning – SEL) पर ज़ोर देती है। शोध बताते हैं कि जिन बच्चों में इमोशनल रेगुलेशन बेहतर होता है, वे स्कूल में अच्छा प्रदर्शन करते हैं, उनके रिश्ते मज़बूत होते हैं और उनमें डिप्रेशन या एंग्जायटी का खतरा काफी कम हो जाता है। लेख में माता-पिता को सलाह दी गई है कि वे बच्चों की भावनाओं को खारिज करने के बजाय उन्हें ‘मान्यता’ (Validation) दें और उन्हें गहरी सांस लेने या भावनाओं को शब्दों में व्यक्त करने की तकनीक सिखाएं।