तेलंगाना में शिक्षा के निजीकरण की खौफनाक तस्वीर: सिर्फ एक साल में बंद हुए 1,969 सरकारी स्कूल, प्राइवेट स्कूलों का बढ़ा दबदबा
विवेक ओझा/हैदराबाद: तेलंगाना के शिक्षा तंत्र से एक ऐसे आंकड़े सामने आए हैं, जो राज्य के सरकारी शिक्षा मॉडल की पोल खोलते हैं और गरीब व मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए एक गहरी चिंता का विषय हैं। एक ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, तेलंगाना में पिछले केवल एक साल के भीतर 1,969 सरकारी स्कूलों को ताला लग गया है। सरकारी स्कूलों के इस तरह से बंद होने के पीछे की सबसे बड़ी वजह छात्रों की घटती संख्या और राज्य में तेज़ी से पैर पसार रहे प्राइवेट स्कूलों का बढ़ता दबदबा है।
शिक्षा विभाग के सूत्रों और ज़मीनी हकीकत से पता चलता है कि सरकारी स्कूलों की यह दुर्दशा कोई अचानक हुई घटना नहीं है, बल्कि यह सालों से चली आ रही प्रशासनिक लापरवाही का नतीजा है। राज्य के अधिकांश सरकारी स्कूलों में बुनियादी ढांचे का भारी अभाव है। पीने का साफ पानी, चालू शौचालय, पक्की छत और बैठने के लिए बेंच जैसी मूलभूत सुविधाएं तक नदारद हैं। इसके अलावा, योग्य शिक्षकों की भारी कमी और शिक्षा की गिरती गुणवत्ता ने अभिभावकों का भरोसा सरकारी सिस्टम से पूरी तरह से तोड़ दिया है।
आज का अभिभावक, चाहे वह दिहाड़ी मज़दूर ही क्यों न हो, अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम (English Medium) की शिक्षा दिलाना चाहता है। प्राइवेट स्कूलों ने इसी नब्ज़ को पकड़ा है। सरकारी स्कूलों की बदहाली का सीधा फायदा निजी स्कूलों को मिल रहा है, जो हर गली-मोहल्ले में कुकुरमुत्ते की तरह उग आए हैं। माता-पिता अपनी गाढ़ी कमाई का एक बड़ा हिस्सा प्राइवेट स्कूलों की भारी-भरकम फीस भरने में लुटा रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि उनके बच्चों का भविष्य सरकारी स्कूलों में सुरक्षित नहीं है।
शिक्षा अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि 1,969 स्कूलों का बंद होना राज्य के गरीब, आदिवासी और हाशिए पर रहने वाले बच्चों के लिए एक बड़ा झटका है, जो निजी स्कूलों की महंगी फीस वहन नहीं कर सकते। उनका आरोप है कि सरकार जानबूझकर सरकारी स्कूलों को बदहाल छोड़ रही है ताकि शिक्षा के निजीकरण (Privatization of Education) को बढ़ावा दिया जा सके। अगर यही स्थिति रही, तो आने वाले समय में मुफ़्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार महज़ कागज़ों तक ही सीमित रह जाएगा।