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12 अगस्त को मनाते हैं विश्व हाथी दिवस : जंगलों के प्रहरी हाथियों के संरक्षण की बढ़ती चुनौती:

नई दिल्ली ( अभिषेक सिंह) : हाथी केवल जंगलों की शान नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन को बनाए रखने वाले महत्वपूर्ण जीव भी हैं। जंगलों में उनकी मौजूदगी पेड़-पौधों के बीजों के प्रसार से लेकर नए रास्तों और जलस्रोतों के निर्माण तक पर्यावरण के कई पहलुओं को प्रभावित करती है। दुनिया के सबसे बड़े स्थलीय जीव के संरक्षण और उनके प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखने के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए हर साल 12 अगस्त को विश्व हाथी दिवस मनाया जाता है। यह दिन हाथियों के सामने मौजूद खतरों और उनके संरक्षण की जरूरत पर दुनिया का ध्यान आकर्षित करने का अवसर देता है। जंगलों का लगातार सिकुड़ना, प्राकृतिक आवासों का विखंडन, अवैध शिकार, रेल और सड़क हादसे तथा मानव बस्तियों का विस्तार हाथियों के अस्तित्व के लिए बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं। ऐसे में हाथियों का संरक्षण केवल एक वन्यजीव प्रजाति को बचाने का प्रयास नहीं, बल्कि जंगलों और उनसे जुड़े पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को सुरक्षित रखने की दिशा में जरूरी कदम है।

विश्व हाथी दिवस की शुरुआत हाथियों के संरक्षण से जुड़े मुद्दों को वैश्विक स्तर पर सामने लाने के उद्देश्य से हुई। इस दिवस के जरिए हाथियों की घटती संख्या, उनके प्राकृतिक आवास की रक्षा और जंगली हाथियों के सामने मौजूद खतरों को लेकर जागरूकता बढ़ाने का प्रयास किया जाता है। हाथियों की कई प्रजातियां और उपप्रजातियां अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में पाई जाती हैं, लेकिन लगभग हर जगह उनके अस्तित्व पर मानवीय गतिविधियों का दबाव बढ़ा है।

भारत में हाथियों का बड़ा प्राकृतिक घर

भारत एशियाई हाथियों के संरक्षण के लिहाज से दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण देशों में शामिल है। देश में दुनिया की 60% से अधिक जंगली एशियाई हाथी आबादी पाई जाती है। हाथी भारत का राष्ट्रीय धरोहर पशु है और वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I के तहत संरक्षित है। हाथियों और उनके आवासों की सुरक्षा के लिए भारत सरकार ने 1991-92 में प्रोजेक्ट एलीफेंट शुरू किया था। इसका उद्देश्य हाथियों, उनके आवास और गलियारों का संरक्षण करने के साथ मानव-हाथी संघर्ष की चुनौती को कम करना और कैद में रखे गए हाथियों के कल्याण को सुनिश्चित करना है। वर्तमान में प्रोजेक्ट एलीफेंट 23 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लागू है।

गलियारों की सुरक्षा से ही संभव होगा संरक्षण

भारत में हाथियों के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में उनके प्राकृतिक आवासों का विखंडन और मानव-हाथी संघर्ष शामिल हैं। हाथी बड़े क्षेत्र में आवाजाही करने वाले वन्यजीव हैं और अलग-अलग वन क्षेत्रों के बीच आने-जाने के लिए पारंपरिक गलियारों पर निर्भर रहते हैं। ऐसे गलियारों पर सड़क, रेल लाइन, खनन, बस्तियों और अन्य निर्माण गतिविधियों का दबाव बढ़ने से हाथियों की आवाजाही प्रभावित होती है। सरकार के Elephant Corridors of India 2023 दस्तावेज के मुताबिक देश में हाथियों के आवासों को जोड़ने वाले गलियारों की सुरक्षा दीर्घकालीन संरक्षण की केंद्रीय रणनीति है। कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, ओडिशा और उत्तराखंड समेत कई राज्यों में महत्वपूर्ण गलियारों के संरक्षण और पुनर्बहाली के प्रयास भी किए गए हैं।

मानव-हाथी संघर्ष बड़ी चुनौती

जब हाथियों का प्राकृतिक आवास सिकुड़ता है और उनके पारंपरिक रास्ते बाधित होते हैं तो मानव-हाथी संघर्ष की स्थिति पैदा होती है। हाथियों के झुंड कई बार खेतों में पहुंचकर फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं। दूसरी ओर, हाथियों और इंसानों की आमने-सामने की स्थिति में जान-माल का नुकसान भी हो सकता है। यह संघर्ष केवल वन्यजीव संरक्षण का मुद्दा नहीं, बल्कि जंगलों के आसपास रहने वाले ग्रामीण समुदायों की आजीविका और सुरक्षा से भी जुड़ा विषय है।