विज्ञान और वैचारिकी के एक युग का अंत: प्रख्यात परमाणु वैज्ञानिक और मार्क्सवादी सिद्धांतकार एम.पी. परमेश्वरन का 92 वर्ष की आयु में निधन
विवेक ओझा/ त्रिशूर: भारत के वैज्ञानिक और बौद्धिक जगत को एक गहरी क्षति पहुंची है। देश के प्रख्यात परमाणु वैज्ञानिक (renowned nuclear scientist) और जाने-माने मार्क्सवादी सिद्धांतकार (Marxist theorist) एम.पी. परमेश्वरन का 92 वर्ष की आयु में निधन हो गया है। उन्होंने मंगलवार को केरल के त्रिशूर (Thrissur) में अंतिम सांस ली। उनके निधन से विज्ञान को आम जनमानस तक पहुंचाने वाले एक बड़े आंदोलन का अंत हो गया है।
एम.पी. परमेश्वरन केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित रहने वाले वैज्ञानिक नहीं थे, बल्कि वे समाज के ज़मीनी मुद्दों से गहरे जुड़े हुए थे। वे केरल में विज्ञान को लोकप्रिय बनाने वाले प्रमुख संगठन ‘केरल शास्त्र साहित्य परिषद’ (Kerala Sastra Sahithya Parishad) के सबसे शुरुआती और अग्रणी सदस्यों (foremost members) में से एक थे। इस संगठन के माध्यम से उन्होंने केरल के साक्षरता अभियानों और पर्यावरण संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
विज्ञान के साथ-साथ परमेश्वरन का राजनीतिक और वैचारिक जीवन भी बेहद उतार-चढ़ाव और बौद्धिक संघर्षों से भरा रहा। वे एक कड़े मार्क्सवादी विचारक थे, लेकिन उनकी स्वतंत्र सोच अक्सर पार्टी लाइन से टकरा जाती थी। ‘चौथी दुनिया’ (fourth world) की अवधारणा पर उनके विचारों ने राजनीतिक हलकों में एक बहुत व्यापक और तीखी बहस (wide debate) छेड़ दी थी। उनके यह विचार पारंपरिक कम्युनिस्ट विचारधारा से इतने अलग थे कि अंततः इसके परिणामस्वरूप वर्ष 2004 में उन्हें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी CPI(M) से निष्कासित (expulsion) कर दिया गया था।
पार्टी से निकाले जाने के बावजूद, वे कभी भी अपने विचारों से पीछे नहीं हटे और जीवन के अंतिम समय तक समाज में तर्कशीलता (rationality) और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने के लिए लिखते और बोलते रहे। उनके जाने से केरल ही नहीं, बल्कि पूरे देश के बुद्धिजीवी वर्ग में शोक की लहर है। उनका जीवन इस बात का प्रमाण था कि एक सच्चा वैज्ञानिक हमेशा एक निडर विचारक भी होता है।