बंगलूरू के एनएलएसआईयू में भी सीजेआई और बीसीआई चेयरमैन का विरोध, दीक्षांत समारोह में शामिल होने के खिलाफ उतरे छात्र
बंगलूरू : हैदराबाद स्थित नालसर यूनिवर्सिटी के बाद अब बंगलूरू स्थित प्रतिष्ठित नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी (एनएलएसआईयू) में भी भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत और बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा के खिलाफ विरोध के स्वर तेज हो गए हैं। एनएलएसआईयू के छात्रों और पूर्व छात्रों ने एक संयुक्त बयान जारी कर आगामी दीक्षांत समारोह में सीजेआई और बीसीआई चेयरमैन के शामिल होने पर कड़ी आपत्ति जताई है।नालसर के छात्रों के समर्थन में आई एकजुटताएनएलएसआईयू के छात्रों और पूर्व छात्रों ने नालसर यूनिवर्सिटी के छात्रों के प्रति अपनी पूरी एकजुटता प्रदर्शित की है। छात्रों का कहना है कि नालसर के विद्यार्थियों ने सत्ता के सामने सच बोलने का अदम्य साहस और नैतिक दृढ़ता का एक अनुकरणीय उदाहरण पेश किया है। गौरतलब है कि इससे पहले नालसर यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में भी सीजेआई सूर्यकांत को छात्रों के भारी विरोध का सामना करना पड़ा था।बीसीआई की कार्रवाई को बताया मनमाना और गैरकानूनीजारी किए गए इस बयान पर 2026 बैच के 165 स्नातक छात्रों, 409 मौजूदा छात्रों और 128 पूर्व छात्रों के हस्ताक्षर हैं। बयान में कहा गया है कि हालांकि बीसीआई ने बाद में नालसर के खिलाफ अपनी सभी कार्यवाहियां और नोटिस वापस ले लिए हैं, लेकिन किसी सार्वजनिक विश्वविद्यालय के छात्रों और शिक्षकों के खिलाफ किसी वैधानिक संस्था द्वारा इस तरह की असंवैधानिक कार्रवाई शुरू किया जाना अपने आप में बेहद गंभीर मामला है। छात्रों का दावा है कि आदेश वापस लेने के बाद भी बीसीआई और उसके चेयरमैन की जिम्मेदारी कम नहीं होती है।दीक्षांत समारोह का अपमानजनक उपयोगछात्रों का कहना है कि किसी भी विश्वविद्यालय का दीक्षांत समारोह छात्र के शैक्षणिक जीवन का सबसे महत्वपूर्ण और गौरवशाली अवसर होता है, जिसमें वर्षों की कड़ी मेहनत का जश्न मनाया जाता है। ऐसे में उन उच्च पदों पर बैठे लोगों को डिग्री प्रदान करने के लिए मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित करना, जिन्होंने सार्वजनिक रूप से छात्रों के प्रति उपेक्षा का भाव व्यक्त किया है, छात्रों के संघर्ष का मजाक उड़ाने जैसा है।छात्रों ने मांग की है कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया को नालसर के छात्र और शिक्षक समुदाय से, उनके अभिव्यक्ति और स्वतंत्र रूप से बोलने के मौलिक अधिकार में हस्तक्षेप करने के प्रयास के लिए बिना शर्त माफी मांगनी चाहिए।