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सांस्कृतिक पहचान को मिली संवैधानिक मुहर: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने केरल का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने वाले बिल को दी मंज़ूरी

राघवेंद्र प्रताप सिंह/ नई दिल्ली / तिरुवनंतपुरम: भारत के दक्षिणी राज्य केरल की भाषाई, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को अंततः वह संवैधानिक और आधिकारिक मान्यता मिल गई है, जिसकी मांग वहां के लोग दशकों से कर रहे थे। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राज्य का नाम आधिकारिक रूप से ‘केरल’ से बदलकर ‘केरलम’ (Keralam) करने वाले महत्वपूर्ण विधेयक को अपनी सहमति (Assent) दे दी है। इस ऐतिहासिक फैसले के बाद, अब सभी सरकारी और अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज़ों में राज्य को उसके मूल मलयालम नाम ‘केरलम’ से ही जाना जाएगा।

इस अहम बदलाव की विधायी प्रक्रिया संसद के हालिया मानसून सत्र में पूरी की गई थी। ‘केरल (नाम परिवर्तन) विधेयक, 2026’ को लोकसभा द्वारा 11 अगस्त 2026 को पारित किया गया था। निचले सदन से मंज़ूरी मिलने के ठीक अगले ही दिन, इस ऐतिहासिक बिल को राज्यसभा ने भी सर्वसम्मति से पारित कर दिया था। राष्ट्रपति भवन से इस पर अंतिम मुहर लगने के साथ ही राज्य सरकार और वहां की जनता में खुशी की लहर दौड़ गई है।

‘केरलम’ शब्द की जड़ें राज्य की मातृभाषा मलयालम में बहुत गहराई से रची-बसी हैं। राज्य के लोगों का मानना था कि ‘केरल’ नाम औपनिवेशिक काल और बाहरी प्रभाव की देन था, जबकि स्थानीय साहित्य, कला और रोज़मर्रा की बोलचाल में लोग हमेशा से अपने राज्य को ‘केरलम’ ही कहते आए हैं। राज्य विधानसभा ने नाम बदलने का एक सर्वसम्मत प्रस्ताव पहले ही केंद्र सरकार को भेजा था, जिसे स्वीकार करते हुए गृह मंत्रालय ने संसद में यह विधेयक पेश किया था।

किसी भी राज्य का नाम बदलना केवल कागज़ी औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह वहां के नागरिकों की भावनाओं और उनके भाषाई गौरव से जुड़ा एक बेहद संवेदनशील मुद्दा होता है। ‘केरलम’ नाम राज्य के भौगोलिक स्वरूप (समुद्र और पहाड़ों के बीच की भूमि) और उसकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का अधिक सटीक प्रतिनिधित्व करता है। अब केंद्र और राज्य सरकार के सभी आधिकारिक पत्राचारों, भारतीय संविधान की अनुसूची 1 और नए जारी होने वाले सभी नक्शों में इस नए नाम को लागू करने की प्रशासनिक प्रक्रिया तेज़ी से शुरू की जाएगी।