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“दहेज के लोभियों के लिए कोई नरमी नहीं”: दिल्ली की अदालत ने कहा- ‘दहेज हत्या का अभिशाप भारतीय समाज में आज भी मौजूद’

अभिषेक सिंह/ नई दिल्ली: इक्कीसवीं सदी के आधुनिक और विकसित होते भारत में आज भी दहेज प्रथा जैसी कुरीतियां महिलाओं के लिए एक जानलेवा अभिशाप बनी हुई हैं। इस गंभीर सामाजिक और कानूनी मुद्दे पर दिल्ली की एक अदालत ने बेहद सख्त रुख अपनाते हुए कड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा है कि भारतीय समाज में दहेज हत्या का अभिशाप आज भी व्यापक रूप से मौजूद है और यह समाज की अंतरात्मा पर एक गहरा दाग है। एक हालिया मामले की सुनवाई करते हुए, दिल्ली की एक अदालत ने एक दोषी के प्रति किसी भी प्रकार की नरमी (leniency) दिखाने से साफ इनकार कर दिया है।

इस महत्वपूर्ण फैसले को सुनाते हुए न्यायाधीश ने न्यायशास्त्र के मूल सिद्धांतों का हवाला दिया। अदालत ने इस बात पर ज़ोर दिया कि ऐसे जघन्य अपराधों में दी जाने वाली सज़ा सीधे तौर पर अपराध की गंभीरता के अनुपात (proportionate) में होनी चाहिए। न्यायपालिका का मानना है कि सज़ा केवल अपराधी को दंडित करने के लिए नहीं होती, बल्कि इसका उद्देश्य समाज में एक कड़ा निवारक संदेश (deterrence) भेजना भी होना चाहिए, ताकि भविष्य में कोई अन्य व्यक्ति इस तरह का अमानवीय कृत्य करने से डरे।

अदालत ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि सज़ा तय करते समय न केवल कानून की किताबों का ध्यान रखा जाना चाहिए, बल्कि पीड़ित के अधिकारों और पूरे समाज के व्यापक हितों को भी ध्यान में रखा जाना अत्यंत आवश्यक है। अक्सर यह देखा गया है कि दहेज के मामलों में लंबी कानूनी प्रक्रिया और गवाहों के मुकर जाने के कारण दोषी साफ बच निकलते हैं या उन्हें बेहद हल्की सज़ा मिलती है। लेकिन दिल्ली की अदालत का यह ताज़ा रुख इस बात का कड़ा संकेत है कि न्यायपालिका अब महिलाओं के खिलाफ होने वाले इन क्रूर अपराधों से निपटने के लिए ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ (शून्य सहनशीलता) की नीति अपना रही है।

दहेज हत्याएं केवल एक कानूनी विफलता नहीं हैं, बल्कि यह एक सामूहिक सामाजिक विफलता को भी दर्शाती हैं। जब एक नवविवाहिता को महज़ कुछ पैसों या भौतिक वस्तुओं की लालच में प्रताड़ित किया जाता है और उसे मौत के घाट उतार दिया जाता है, तो यह पूरे नागरिक समाज की चेतना पर सवाल खड़े करता है। कानूनी विशेषज्ञों और महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने अदालत की इस टिप्पणी का ज़ोरदार स्वागत किया है। उनका मानना है कि जब तक अदालतों से अपराधियों को सख़्त और त्वरित सज़ा नहीं मिलेगी, तब तक समाज में दहेज के दानवों के मन में कानून का खौफ पैदा नहीं होगा। यह फैसला निश्चित रूप से भविष्य के मामलों के लिए एक मज़बूत नज़ीर साबित होगा।