“लोकतंत्र को अलग-अलग चुनावी लय की ज़रूरत”: शशि थरूर ने ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ को बताया राज्यों की स्वायत्तता और संविधान की भावना के खिलाफ

इंडियन व्यू टीम/ नई दिल्ली: भारतीय राजनीति में इन दिनों ‘एक देश, एक चुनाव’ (One Nation, One Election – ONOE) का मुद्दा राजनीतिक विमर्श के केंद्र में है। केंद्र सरकार जहां इसे चुनावी खर्च कम करने, नीतिगत पंगुता (Policy Paralysis) को रोकने और समय बचाने का एक ऐतिहासिक कदम बता रही है, वहीं विपक्ष और कई प्रमुख राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे भारतीय लोकतंत्र की मूल भावना के लिए एक बड़ा खतरा करार दिया है। इसी अहम बहस के बीच, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और प्रख्यात लेखक शशि थरूर (Shashi Tharoor) ने एक विस्तृत लेख के माध्यम से इस प्रस्ताव की तीखी आलोचना की है।
थरूर ने स्पष्ट तर्क दिया है कि भारत जैसे विशाल, बहुलवादी और विविधतापूर्ण लोकतंत्र को सुचारू रूप से चलने के लिए एक ही ‘चुनावी लय’ (electoral rhythms) के बजाय अलग-अलग और स्वतंत्र चुनावी प्रक्रियाओं की आवश्यकता है। उन्होंने चेतावनी दी है कि ‘एक देश, एक चुनाव’ का प्रस्ताव लागू होने से सबसे पहला और सबसे बड़ा नुकसान भारत की संघीय संरचना (Federal Structure) को होगा, क्योंकि इससे राज्यों की स्वायत्तता (State autonomy) बुरी तरह से नष्ट (erode) हो जाएगी।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि जब राष्ट्रीय (लोकसभा) और राज्य (विधानसभा) के चुनाव एक साथ होंगे, तो ज़मीनी और स्थानीय मुद्दे बड़े राष्ट्रीय विमर्श के नीचे पूरी तरह से दब जाएंगे। मतदाता अक्सर राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर अलग-अलग सोच के साथ वोट करते हैं, लेकिन एक साथ चुनाव होने पर एक ‘कृत्रिम लहर’ (Artificial Wave) का असर स्थानीय राजनीति को भी अपने प्रभाव में ले सकता है। यह मॉडल चुनावी जनादेश को विकृत (distort electoral mandates) कर सकता है, जिसका सबसे बड़ा नुकसान क्षेत्रीय राजनीतिक दलों को उठाना पड़ेगा।
इसके साथ ही, यह व्यवस्था लोकतांत्रिक जवाबदेही (democratic accountability) को भी गंभीर रूप से कमज़ोर करेगी। लोकतंत्र में चुनाव वह समय होता है जब जनता अपने प्रतिनिधियों से सीधे सवाल करती है और उनके कामकाज का हिसाब मांगती है। अगर राजनेताओं को पांच साल में केवल एक ही बार जनता के बीच जाना पड़ेगा, तो उनके निरंकुश होने की संभावना काफी बढ़ जाएगी। अलग-अलग समय पर होने वाले राज्य स्तरीय चुनाव राजनीतिक दलों को लगातार ज़मीनी हकीकत से जोड़े रखते हैं और उन्हें जनता के प्रति जवाबदेह बनाए रखते हैं।
इस पूरे प्रस्ताव का कड़ा विरोध करते हुए, लेख में यह भी कहा गया है कि ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ मॉडल हमारे गणराज्य की संवैधानिक भावना (constitutional spirit of the republic) का अवमूल्यन (devalues) करता है। भारत का संविधान लचीला है; इसे इस तरह से डिज़ाइन किया गया है कि यह गठबंधन सरकारों के गिरने, मध्यावधि चुनावों और क्षेत्रीय राजनीतिक संकटों को आसानी से समायोजित कर सके।
एक बड़ा व्यावहारिक सवाल यह भी है कि यदि ‘एक देश, एक चुनाव’ लागू होने के बाद किसी राज्य में महज़ 2 साल में सरकार अपना बहुमत खो देती है, तो क्या होगा? क्या वहां बचे हुए 3 सालों के लिए अलोकतांत्रिक तरीके से राष्ट्रपति शासन थोपा जाएगा? पूरे देश पर एक कृत्रिम और समकालिक (synchronised timeline) चुनावी ढांचा थोपना देश के लोकतांत्रिक स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक साबित हो सकता है। यह महज़ एक प्रशासनिक या चुनावी सुधार नहीं है, बल्कि संविधान के मूल ढांचे से जुड़ा एक बेहद गंभीर विषय है, जिस पर व्यापक राष्ट्रीय सहमति (National Consensus) के बिना कोई भी कदम उठाना जल्दबाज़ी होगी।