नई अफीम नीति से पहले किसानों की केंद्र से बड़ी हुंकार: खेती के लिए मांगे अधिक लाइसेंस, फसल का दाम ₹1 लाख प्रति किलो करने की उठाई मांग

अभिषेक सिंह/ नई दिल्ली / भोपाल: भारत में अफीम (Opium) की खेती एक बेहद संवेदनशील और कड़ाई से विनियमित (Regulated) कृषि क्षेत्र है। केंद्र सरकार द्वारा सितंबर महीने में 2026-27 के लिए नई ‘अफीम लाइसेंसिंग नीति’ (Opium licensing policy) की घोषणा की जानी है। इस अहम घोषणा से ठीक पहले मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के हज़ारों अफीम किसानों ने लामबंद होकर केंद्र सरकार के सामने अपनी प्रमुख मांगें रख दी हैं। किसानों ने एक सुर में सरकार से आग्रह किया है कि नई नीति को इस तरह से तैयार किया जाए जिससे देश की अर्थव्यवस्था के साथ-साथ किसानों को भी सीधा और उचित आर्थिक लाभ मिल सके।

किसानों के प्रतिनिधिमंडलों ने वित्त मंत्रालय और नारकोटिक्स विभाग (Narcotics Department) के समक्ष अपनी जो मांगें रखी हैं, उनमें सबसे प्रमुख मांग अफीम की सरकारी खरीद दर को लेकर है। वर्तमान में सरकार किसानों से बेहद कम दामों पर अफीम खरीदती है, जबकि अंतरराष्ट्रीय दवा बाज़ार में इसकी कीमत बहुत अधिक है। किसानों ने मांग की है कि उनकी फसल की कीमत बढ़ाकर 1 लाख रुपये प्रति किलोग्राम की जाए, ताकि उनकी कड़ी मेहनत का सही मूल्य उन्हें मिल सके। इसके साथ ही, किसानों ने सरकार से अफीम की खेती के लिए अधिक संख्या में नए लाइसेंस (farming licences) जारी करने की भी पुरज़ोर वकालत की है।

इस पूरे मामले में एक और बेहद अहम और कानूनी पेंच ‘पोस्ता की भूसी’ (Poppy straws) को लेकर है। किसानों ने सरकार से स्पष्ट मांग की है कि पोस्ता की भूसी को ‘स्वापक औषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम’ (NDPS Act) के दायरे से पूरी तरह बाहर (Exclude) किया जाना चाहिए। किसानों का तर्क है कि पोस्ता की भूसी कोई नशीला पदार्थ (narcotic substance) नहीं है, बल्कि यह महज़ अफीम के पौधे का छिलका (husk) है, जिसका उपयोग कई अन्य पारंपरिक कार्यों में होता है। एनडीपीएस एक्ट जैसे बेहद सख्त कानून के तहत भूसी को रखने के कारण अक्सर निर्दोष किसानों को पुलिस और एजेंसियों द्वारा बेवजह परेशान किया जाता है और उन पर झूठे मुकदमे लाद दिए जाते हैं।

भारत उन चुनिंदा देशों में से एक है जहां चिकित्सा और वैज्ञानिक उद्देश्यों (Medical and scientific purposes) के लिए कानूनी रूप से अफीम की खेती की अनुमति है। मध्य प्रदेश का मंदसौर-नीमच बेल्ट, राजस्थान का चित्तौड़गढ़-प्रतापगढ़ और उत्तर प्रदेश का बाराबंकी क्षेत्र इस खेती के मुख्य केंद्र हैं। इन क्षेत्रों के लाखों किसानों की आजीविका इसी फसल पर निर्भर है। किसानों का कहना है कि कड़े सरकारी नियमों और मौसम की मार के कारण अफीम की खेती अब घाटे का सौदा बनती जा रही है। ऐसे में यदि सरकार आगामी सितंबर की नीति में उनके हितों को ध्यान में नहीं रखती है, तो ग्रामीण स्तर पर एक बड़ा असंतोष भड़क सकता है, जो इन राज्यों की राजनीति को भी सीधे तौर पर प्रभावित करेगा।