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जंतर-मंतर पर छात्रों के विरोध प्रदर्शन से जुड़े पुलिस की ज्यादतियों की जांच के लिए एक उच्च-अधिकार प्राप्त समिति का गठन करेगा सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली ( विवेक ओझा) : सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि वह पिछले महीने दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों के विरोध प्रदर्शन से जुड़े पुलिस की ज्यादतियों के आरोपों और अन्य मुद्दों की जांच के लिए एक उच्च-अधिकार प्राप्त समिति का गठन करेगा. इस मामले की सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने की.

पीठ ने संकेत दिया कि इस समिति में सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व न्यायाधीश, एक हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश और महानिदेशक स्तर से सेवानिवृत्त हुए एक अधिकारी के शामिल होने की संभावना है. पीठ ने कहा कि वह कल इस पैनल के सदस्यों के नामों की घोषणा करेगी. सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा, “जैसा कि हमने कहा है कि हम एक उच्च-अधिकार प्राप्त समिति का गठन करेंगे. कुछ उपाय तत्काल अंतरिम प्रकृति के होंगे।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि शिकायतें दोनों पक्षों, पुलिस और प्रदर्शनकारियों की तरफ से दर्ज की गई थीं. उन्होंने आगे कहा कि अगर पुलिस की ओर से कर्तव्य में कोई लापरवाही हुई है, तो हम इस पर हाई-पावर्ड कमेटी के साथ परामर्श करके कार्रवाई करेंगे. इस पर पीठ ने जवाब दिया कि एक बार जब वह HPC का गठन कर रही है, तो फिर इसे उन्हीं पर छोड़ दिया जाना चाहिए.

दिल्ली पुलिस ने एक हलफनामे में फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी (चेहरा पहचानने वाली तकनीक) के जरिए बड़े पैमाने पर निगरानी रखने के आरोपों को खारिज कर दिया. पुलिस ने कहा कि यह सिस्टम हर व्यक्ति की प्रोफाइलिंग नहीं करता है, बल्कि केवल उन्हीं लोगों का डेटा कैप्चर करता है जिनका पुराना आपराधिक रिकॉर्ड है. मेहता ने तर्क दिया कि आपराधिक पृष्ठभूमि वाले इन लोगों की जांच पुलिस कमिश्नर द्वारा गठित एक विशेष जांच दल द्वारा की जाएगी।

पीठ ने संकेत दिया कि वह निर्दोष प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल कर सकती है. लेकिन, आपराधिक इतिहास वाले प्रदर्शनकारियों के मामलों की अलग से जांच की जाएगी. पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि विरोध करने के अधिकार को आपराधिक आचरण से अलग देखा जाना चाहिए.

पीठ ने कहा, “हमें अनुच्छेद 19, भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा शांतिपूर्ण विरोध को याद रखना चाहिए. उनके मामले को आपराधिक तत्वों से पूरी तरह अलग किया जा सकता है.” मेहता ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द कर सकता है, लेकिन उन्होंने आपराधिक इतिहास वाले लोगों के लिए एक अलग दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया।

अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने पीठ से अनुरोध किया कि याचिकाकर्ताओं के वकीलों को सभी एफआईआर की प्रतियां उपलब्ध कराई जाएं ताकि वे उन्हें अलग करने में मदद कर सकें. उन्होंने पेलेट गन से घायल हुए पीड़ितों के लिए मुआवजे की भी मांग की.

वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासात ने तर्क दिया कि कुछ पुलिस अधिकारियों से जुड़े सार्वजनिक वीडियो उपलब्ध हैं जो गहरी चिंता का विषय हैं. अगर कोई समिति उनकी जांच करती है तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं है. फरासात ने कहा कि निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर ज्यादती करने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कुछ अंतरिम कार्रवाई की जानी चाहिए.

पीठ ने टिप्पणी की, “दोनों पक्ष एफआईआर की एक सूची दें. आइए हम उस क्षेत्र की पहचान करें जहां कोई विवाद नहीं है. लेकिन जहां आपराधिक इतिहास भी है, वहां हम तय करेंगे कि क्या करना है।