छात्रों के कड़े विरोध के आगे झुकी तमिलनाडु सरकार: कॉलेजों में प्रदर्शन रोकने वाला विवादित प्रशासनिक आदेश भारी हंगामे के बाद लिया गया वापस

राघवेन्द्र प्रताप सिंह/ चेन्नई: लोकतांत्रिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की आज़ादी को लेकर तमिलनाडु की राजनीति में पिछले कुछ दिनों से चल रहा भारी बवाल आखिरकार सरकार के पीछे हटने के साथ शांत हो गया है। तमिलनाडु सरकार ने उस विवादित प्रशासनिक आदेश को आधिकारिक तौर पर वापस ले लिया है, जिसमें राज्य भर के सरकारी कॉलेजों के प्राचार्यों (Principals) को निर्देश दिया गया था कि वे छात्रों को किसी भी प्रकार के विरोध प्रदर्शन में भाग लेने से रोकें।

इस पूरे विवाद की शुरुआत तब हुई जब उच्च शिक्षा विभाग की ओर से राज्य के सभी ‘सरकारी कला एवं विज्ञान कॉलेजों’ और ‘शिक्षा कॉलेजों’ (Colleges of Education) के प्राचार्यों को एक लिखित आदेश जारी किया गया। इस आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि कॉलेज प्रशासन ‘उचित और समन्वित कार्रवाई’ (coordinated action) करे ताकि छात्रों को किसी भी प्रकार के विरोध प्रदर्शनों या धरने (protests or demonstrations) में भाग लेने से रोका जा सके।

जैसे ही यह आदेश सार्वजनिक हुआ, राज्य भर के छात्र संगठनों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और विपक्षी दलों ने सरकार के खिलाफ ज़ोरदार मोर्चा खोल दिया। छात्रों का तर्क था कि शांतिपूर्ण तरीके से विरोध प्रदर्शन करना एक लोकतांत्रिक अधिकार है और सरकार प्रशासनिक ताकत का इस्तेमाल कर परिसरों में असहमति की आवाज़ को कुचलना चाहती है। जुलाई महीने में चेन्नई में हुए ‘नीट’ (NEET) विरोधी प्रदर्शनों के बाद सरकार छात्रों की एकजुटता से सतर्क थी, जिसे इस आदेश का मुख्य कारण माना जा रहा था।

चौतरफा राजनीतिक और सामाजिक दबाव बढ़ते देख, राज्य सरकार को बैकफुट पर आना पड़ा और अंततः इस ‘लोकतंत्र-विरोधी’ माने जा रहे आदेश को रद्द कर दिया गया। यह घटना इस बात का ज्वलंत उदाहरण है कि एक जीवंत लोकतंत्र में नागरिक समाज और छात्रों की एकजुटता किस तरह सरकारी नीतियों पर अपना प्रभाव डाल सकती है। सरकार के इस कदम के बाद कॉलेज परिसरों में छात्रों ने अपनी जीत का जश्न मनाया है।