जलवायु कूटनीति में बढ़ा टकराव: ब्रिक्स (BRICS) देशों ने यूरोपीय संघ के ‘कार्बन टैक्स’ की कड़ी निंदा की, विकासशील देशों के लिए मांगा अधिक फंड

विवेक ओझा/ नई दिल्ली: वैश्विक व्यापार और जलवायु परिवर्तन के मोर्चे पर दुनिया दो स्पष्ट धड़ों में बंटती नज़र आ रही है। भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका जैसे प्रमुख विकासशील देशों के समूह ब्रिक्स (BRICS) ने यूरोपीय संघ (EU) द्वारा लगाए जा रहे विवादास्पद ‘कार्बन टैक्स’ (Carbon tax) की बेहद कड़े शब्दों में निंदा की है। ब्रिक्स देशों का मानना है कि पर्यावरण संरक्षण की आड़ में यूरोप यह अनुचित व्यापारिक बाधाएं खड़ी कर रहा है।

विवाद के केंद्र में यूरोपीय संघ का नया ‘कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म’ (Carbon Border Adjustment Mechanism – CBAM) है। इस नए कड़े नियम के तहत, यूरोप में आयात होने वाले कार्बन-सघन उत्पादों (carbon-intensive products) जैसे कि लोहा और स्टील (iron and steel), एल्युमीनियम (aluminium), सीमेंट, उर्वरक (fertilisers), हाइड्रोजन और बिजली (electricity) के आयातकों को अब अपने उत्पादन से जुड़े कार्बन उत्सर्जन (carbon emissions) का पूरा हिसाब देना होगा और उस पर टैक्स चुकाना होगा।

विकासशील देशों के लिए यह एक बहुत बड़ा कूटनीतिक और आर्थिक झटका है। ब्रिक्स का तर्क है कि भारत और चीन जैसे देश अभी औद्योगीकरण के चरण में हैं। ऐतिहासिक रूप से कार्बन उत्सर्जन कर अपनी अर्थव्यवस्थाओं को विकसित कर चुके पश्चिमी देश अब विकासशील देशों के उत्पादों पर इस तरह का कर लगाकर वैश्विक बाज़ार में अपनी मनमानी कर रहे हैं।

इस टैक्स के विरोध के साथ ही, ब्रिक्स देशों ने एक सुर में अंतरराष्ट्रीय फंडिंग (international funding) में उल्लेखनीय वृद्धि का भी आह्वान किया है। उनका कहना है कि अमीर देशों को गरीब और विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल (adapt to climate change) बनाने के लिए वादे के अनुसार आर्थिक सहायता और तकनीक प्रदान करनी चाहिए, न कि दंडात्मक कर लगाकर उनके विकास को रोकना चाहिए। यह मुद्दा आगामी विश्व व्यापार संगठन (WTO) और जलवायु सम्मेलनों में एक बड़े कूटनीतिक टकराव का कारण बनने वाला है, जहाँ ग्लोबल साउथ (Global South) एकजुट होकर पश्चिमी नीतियों का कड़ा प्रतिकार करेगा।