गोवा में ‘वंदे मातरम’ पर सियासी घमासान: भाजपा ने लगाया राष्ट्रीय गीत के अपमान का आरोप, मल्लिकार्जुन खरगे ने दिया करारा जवाब

राघवेन्द्र प्रताप सिंह
नई दिल्ली / पणजी
राष्ट्रीय प्रतीकों और राष्ट्रवाद के मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) और कांग्रेस के बीच एक बार फिर तीखी राजनीतिक बयानबाज़ी शुरू हो गई है। ताज़ा विवाद गोवा में सामने आया है, जहाँ भाजपा ने कांग्रेस पार्टी पर राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ का जानबूझकर अपमान (disrespecting Vande Mataram) करने का गंभीर आरोप लगाया है। इस राजनीतिक विवाद ने देश भर के समाचार माध्यमों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है।
भारतीय जनता पार्टी की ओर से इस हमले का नेतृत्व पार्टी के कद्दावर नेता, सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद (Ravi Shankar Prasad) ने किया। उन्होंने कांग्रेस की विचारधारा पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि पार्टी के कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम’ को लेकर जो रवैया अपनाया जा रहा है, वह न केवल राष्ट्रीय गीत का अपमान है, बल्कि देश के स्वतंत्रता सेनानियों की भावनाओं को भी आहत करता है। भाजपा लंबे समय से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के मुद्दों पर कांग्रेस को घेरती रही है, और यह ताज़ा हमला भी उसी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
भाजपा के इन गंभीर आरोपों पर पलटवार करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे (Mallikarjun Kharge) ने खुद मोर्चा संभाला और कड़ा जवाब दिया। खरगे ने भाजपा के दावों को सिरे से खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि कांग्रेस पार्टी ने हमेशा राष्ट्रीय प्रतीकों का सर्वोच्च सम्मान किया है। उन्होंने अपनी बात को ऐतिहासिक तथ्यों से जोड़ते हुए कहा कि कांग्रेस के मंचों पर ‘वंदे मातरम’ का वही संस्करण (same version) गाया जाता है, जिसे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi), सरदार वल्लभभाई पटेल (Sardar Vallabhbhai Patel) और यहां तक कि पूर्व प्रधानमंत्री व भाजपा के संस्थापक नेता अटल बिहारी वाजपेयी (Atal Bihari Vajpayee) ने स्वीकार और पालन किया था।
कांग्रेस अध्यक्ष का यह जवाब सीधे तौर पर भाजपा को यह बताने का प्रयास है कि राष्ट्रीय गीत पर कोई एक पार्टी अपना एकाधिकार नहीं जता सकती। खरगे द्वारा अटल बिहारी वाजपेयी का नाम लेना एक रणनीतिक कदम माना जा रहा है, ताकि भाजपा के हमलों को उसी के वैचारिक खेमे में वापस धकेला जा सके। यह राजनीतिक बहस इस बात का स्पष्ट संकेत है कि आगामी विधानसभा और स्थानीय चुनावों में ‘राष्ट्रवाद’ और ‘राष्ट्रीय प्रतीकों’ का मुद्दा एक बार फिर चुनाव प्रचार के केंद्र में रहने वाला है।