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“नया संसद भवन एक ‘आत्मारहित’ सम्मेलन केंद्र जैसा”: कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने वास्तुकला और राजनीतिक ध्रुवीकरण पर कसा तंज*

विवेक ओझा
नई दिल्ली

देश की लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और संसदीय परंपराओं पर हमेशा अपनी बेबाक राय रखने वाले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और तिरुवनंतपुरम से सांसद शशि थरूर (Shashi Tharoor) ने भारत के नए संसद भवन को लेकर एक बेहद तीखी और विश्लेषणात्मक टिप्पणी की है। उन्होंने वास्तुकला को राजनीति से जोड़ते हुए नए संसद भवन को एक “आत्मारहित सम्मेलन केंद्र” (soulless conference centre) करार दिया है, जिसमें संवाद और घनिष्ठता का भारी अभाव है।

गुरुवार, 20 अगस्त 2026 को दिए गए अपने एक बयान में शशि थरूर ने पुरानी और नई संसद के बीच के वैचारिक और भौतिक अंतर को स्पष्ट किया। पुरानी संसद की गोलाकार संरचना और बैठने की व्यवस्था को अक्सर एक-दूसरे के करीब और संवाद-अनुकूल माना जाता था। थरूर का तर्क है कि नई इमारत अपनी विशालता और भव्यता के बावजूद सांसदों के बीच एक अजीब सी ‘दूरी’ (distancing) पैदा करती है।

उन्होंने इस ‘भौतिक दूरी’ को भारतीय राजनीति की वर्तमान स्थिति के साथ जोड़ते हुए एक गहरा तंज कसा। थरूर ने कहा, “इस नई इमारत में एक प्रकार की दूरी है, जो लगभग हमारी राजनीति के ध्रुवीकरण (polarisation of our politics) के लिए एक रूपक (metaphor) प्रतीत होती है।” उनका यह बयान इस ओर इशारा करता है कि जिस तरह सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच वैचारिक दूरियां और संवादहीनता बढ़ती जा रही है, ठीक वैसा ही प्रतिबिम्ब इस नई इमारत के विशाल, फैले हुए और अलग-थलग करने वाले डिज़ाइन में नज़र आता है।

एक जीवंत लोकतंत्र में संसद केवल ईंट-पत्थरों से बनी एक इमारत नहीं होती, बल्कि यह वह स्थान होता है जहाँ पक्ष और विपक्ष के नेता एक-दूसरे की आंखों में देखकर बहस करते हैं, असहमति जताते हैं और अंततः देशहित में फैसले लेते हैं। थरूर की यह आलोचना उन लोगों की चिंताओं को स्वर देती है जो मानते हैं कि आधुनिक सुविधाओं के नाम पर संसद की वह पुरानी ‘आत्मीयता’ और ‘सामूहिकता’ कहीं खो गई है। उनके इस बयान ने राजनीतिक हलकों में वास्तुकला, संसदीय शिष्टाचार और लोकतंत्र में संवाद के महत्व पर एक नई और दिलचस्प बहस को जन्म दे दिया है।