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संसद के विशेष सत्र की अटकलें तेज: परिसीमन विधेयक पर सरकार की नजर, दक्षिणी राज्यों के दौरे पर अमित शाह

New Delhi : संसद के मानसून सत्र के अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के बाद से राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। मानसून सत्र के सत्रावसान (Prorogation) में हो रही असामान्य देरी के कारण यह कयास लगाए जा रहे हैं कि सरकार अभी भी देश में परिसीमन (Delimitation) से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को संसद के पटल पर लाने का विकल्प खुला रखना चाहती है। इसी रणनीति के तहत सरकार मानसून सत्र के विस्तार पर भी विचार कर रही है।तकनीकी रूप से अभी भी जीवित है मानसून सत्रसंसदीय नियमों के इतिहास में पिछले साढ़े चार दशकों में यह पहला ऐसा मौका है जब सत्र समाप्त होने के 8 दिन बाद भी इसके आधिकारिक सत्रावसान की घोषणा नहीं की गई है। सामान्य तौर पर 13 अगस्त को ही मानसून सत्र समाप्त हो चुका है, लेकिन राष्ट्रपति को सत्रावसान की सलाह न दिए जाने के कारण यह तकनीकी रूप से अभी भी जीवित माना जा रहा है।साठ और सत्तर के दशक में सत्र समाप्त होने के बाद सत्रावसान की प्रक्रिया में 6 से 20 दिन का समय लगता था, लेकिन 80 के दशक के बाद से यह अवधि घटकर महज 2 से 4 दिन रह गई थी। इस बार 13 अगस्त के बाद कैबिनेट की दो बैठकें हो चुकी हैं, इसके बावजूद राष्ट्रपति को सत्रावसान की औपचारिक सलाह नहीं दी गई है।दक्षिणी राज्यों के दौरे पर गृह मंत्री अमित शाह की सक्रियताइस राजनीतिक रणनीति को दक्षिण भारत के राज्यों के साथ संवाद से भी जोड़कर देखा जा रहा है। हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद की 31वीं बैठक के दौरान दक्षिण भारतीय राज्यों के नेतृत्व के साथ संवाद किया है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि परिसीमन प्रक्रिया को लेकर दक्षिण के राज्यों में उठने वाली चिंताओं और आशंकाओं को दूर करने के लिए केंद्र सरकार राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर जमीन तैयार कर रही है।संख्याबल पूरा होने के बावजूद क्यों है एहतियात?सूत्रों के अनुसार, इस संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा सरकार के पास पूरी तरह से उपलब्ध है। हालांकि, चूंकि यह देश के परिसीमन और संसदीय क्षेत्रों के पुनर्गठन से जुड़ा एक बेहद संवेदनशील और बड़ा संवैधानिक संशोधन है, इसलिए सरकार इसे हंगामे या जल्दबाजी के माहौल में पेश नहीं करना चाहती है। सरकार की कोशिश यही है कि इस महत्वपूर्ण विधेयक पर कांग्रेस के अलावा अन्य बड़े विपक्षी दलों को भी भरोसे में लिया जाए, ताकि संसद में व्यापक आम सहमति बन सके।