Trending

तीस्ता से सिंधु तक: क्या भारत के खिलाफ नया वॉटर डिप्लोमेसी मोर्चा खोल रहे हैं पड़ोसी मुल्क?

New Delhi : अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के पटल पर एक बार फिर पानी बड़े संघर्ष का जरिया बनता दिख रहा है। भारत के दो पड़ोसी देश पाकिस्तान और बांग्लादेश की नीतियां अब लगभग एक ही ट्रैक पर आगे बढ़ती नजर आ रही हैं। जिस तरह से दोनों मुल्कों ने जल समझौतों और अंतरराष्ट्रीय मंचों का हवाला देकर भारत पर दबाव बनाने की रणनीति अपनाई है, उससे यह सवाल खड़ा होने लगा है कि क्या नई दिल्ली के खिलाफ पानी के मुद्दे पर कोई अनौपचारिक साझा मोर्चा तैयार हो रहा है।बांग्लादेश की नई मांग और तीस्ता पर तकरारबांग्लादेश के जल संसाधन मंत्री मोहम्मद शाहिद उद्दीन चौधरी अनी ने गंगा जल संधि को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने मांग की है कि जब इस साल दिसंबर में यह संधि समाप्त होने के बाद रिन्यू हो, तो इसमें ‘गारंटी क्लॉज’ यानी न्यूनतम पानी मिलने की कानूनी गारंटी को अनिवार्य रूप से जोड़ा जाए। उनका कहना है कि 1977 की संधि में यह प्रावधान था, जिसे बाद में हटा दिया गया था। मंत्री ने साफ चेतावनी दी है कि यदि भारत उनकी मांग नहीं मानता है, तो बांग्लादेश संयुक्त राष्ट्र सहित तमाम अंतरराष्ट्रीय मंचों का दरवाजा खटखटाने से पीछे नहीं हटेगा।पाकिस्तान की तर्ज पर अंतरराष्ट्रीय मंचों का रुखखास बात यह है कि कुछ समय पहले पाकिस्तान ने भी सिंधु जल संधि को लेकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का रुख किया था। हालांकि इस्लामाबाद के उस प्रयास को वैश्विक स्तर पर कोई खास तवज्जो नहीं मिली थी, लेकिन अब ढाका के तेवर भी कुछ वैसे ही नजर आ रहे हैं। बांग्लादेश ने पिछले साल यूएनईसीई वाटर कन्वेंशन पर हस्ताक्षर किए हैं, जो भले ही भारत पर कानूनी रूप से बाध्यकारी न हो, लेकिन इसका इस्तेमाल कूटनीतिक दबाव बनाने और अपनी मांगों को अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में सही साबित करने के लिए किया जा रहा है।द्विपक्षीय रिश्तों और कूटनीति पर असरबांग्लादेशी नेतृत्व का यह भी कहना है कि वे भारत के साथ अपने रिश्ते बिगाड़ना नहीं चाहते, लेकिन तीस्ता परियोजना को लेकर उनकी प्राथमिकताएं स्पष्ट हैं। ढाका यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि यदि द्विपक्षीय बातचीत से समाधान नहीं निकला, तो इस मुद्दे को वैश्विक मंचों पर जोर-शोर से उठाया जाएगा। पाकिस्तान और बांग्लादेश की इन मिलती-जुलती रणनीतियों और बयानों ने भारत के सामरिक गलियारों में हलचल बढ़ा दी है, और अब देखना यह होगा कि नई दिल्ली कूटनीतिक मोर्चे पर इन पड़ोसी देशों के इस नए दबाव से कैसे निपटती है।