सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: दयानिधि मारन की याचिका पर हाईकोर्ट का आदेश रद्द, टेलीकॉम सचिव को समन करने पर लगाई रोक

अभिषेक सिंह
नई दिल्ली
देश की सर्वोच्च अदालत ने भ्रष्टाचार के एक हाई-प्रोफाइल मामले में अहम फैसला सुनाते हुए मद्रास उच्च न्यायालय के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें पूर्व केंद्रीय मंत्री और डीएमके (DMK) सांसद दयानिधि मारन की एक याचिका को मंज़ूरी दी गई थी। इस फैसले के बाद केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को बड़ी राहत मिली है, जो इस मामले की जांच कर रही है।
जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस अरुण पल्ली की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई की। दरअसल, सीबीआई ने उच्च न्यायालय के 25 मार्च के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें दयानिधि मारन के अनुरोध पर दूरसंचार सचिव (Telecom Secretary) को मामले में गवाह के रूप में पेश होने के लिए समन जारी करने की अनुमति दी गई थी। सीबीआई का तर्क था कि जांच और अदालती प्रक्रिया को लंबा खींचने तथा अनावश्यक रूप से शीर्ष अधिकारियों को गवाह के कटघरे में खड़ा करने की यह एक सोची-समझी रणनीति हो सकती है।
सीबीआई ने शीर्ष अदालत के समक्ष मजबूती से अपनी बात रखते हुए कहा कि गवाहों को बुलाने की प्रक्रिया मामले की प्रासंगिकता पर आधारित होनी चाहिए। दयानिधि मारन, जो यूपीए सरकार में दूरसंचार मंत्री रह चुके हैं, के खिलाफ सीबीआई द्वारा दर्ज मामले में कानूनी दांवपेच लगातार जारी हैं। उच्च न्यायालय ने मारन की दलील को स्वीकार करते हुए मौजूदा या पूर्व टेलीकॉम सचिव को तलब करने का जो रास्ता साफ किया था, सुप्रीम कोर्ट ने अब उस पर पूरी तरह से विराम लगा दिया है।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला स्पष्ट करता है कि वीवीआईपी (VVIP) आरोपियों द्वारा हाई-प्रोफाइल गवाहों को बुलाने की मांगों को अदालतें केवल तभी स्वीकार करेंगी, जब उनका सीधा और अत्यंत महत्वपूर्ण संबंध मामले से हो। यह फैसला निचली अदालतों के लिए भी एक नज़ीर बनेगा कि गवाहों को समन करते समय जांच एजेंसी की आपत्तियों को भी समान महत्व दिया जाए। इस रोक के बाद अब मारन के खिलाफ चल रहे मुख्य मामले की सुनवाई में तेज़ी आने की उम्मीद है।