काज़ीरंगा एनिमल कॉरिडोर में अवैध निर्माण पर असम सरकार ‘मौन’: सुप्रीम कोर्ट पैनल के नोटिस के 4 साल बाद भी नहीं मिला कोई जवाब

विवेक ओझा
गुवाहाटी / नई दिल्ली
विश्व प्रसिद्ध एक सींग वाले गैंडों (One-horned rhino) के प्राकृतिक आवास काज़ीरंगा राष्ट्रीय उद्यान (Kaziranga National Park) की सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण को लेकर असम सरकार की घोर प्रशासनिक लापरवाही सामने आई है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित एक विशेष पैनल के कड़े निर्देशों और स्पष्टीकरण मांगने के चार साल बाद भी, असम सरकार एनिमल कॉरिडोर्स (जानवरों के आवागमन के रास्तों) में हो रहे अवैध निर्माणों पर पूरी तरह से चुप्पी साधे हुए है। यह ‘मौन’ राज्य के वन्यजीव संरक्षण के दावों पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
इस मामले की जड़ें सुप्रीम कोर्ट के 12 अप्रैल, 2019 के एक ऐतिहासिक आदेश से जुड़ी हैं। उस आदेश में शीर्ष अदालत ने कार्बी आंगलोंग (Karbi Anglong) ज़िले के महत्वपूर्ण पहाड़ी जलग्रहण क्षेत्रों और गैंडों के आवास की दक्षिणी सीमा के साथ हर प्रकार के खनन (mining), पत्थर उत्खनन (stone quarrying) और संबंधित गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध (banned) लगा दिया था। इसका उद्देश्य वन्यजीवों के प्राकृतिक रास्तों को मानवीय अतिक्रमण से बचाना था।
सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिए गठित ‘केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति’ (Central Empowered Committee – CEC) ने मार्च 2022 में असम के मुख्य सचिव (Chief Secretary) को एक सख्त नोटिस भेजा था। इस नोटिस में 9 मान्यता प्राप्त एनिमल कॉरिडोर्स में से प्रत्येक में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन कर की जा रही गतिविधियों की सूची पर “बिना किसी देरी” (without delay) के जवाब मांगा गया था। विडंबना यह है कि आज 4 साल बीत जाने के बाद भी राज्य सरकार की ओर से इस पर कोई संतोषजनक जवाब या रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की गई है।
जानवरों के कॉरिडोर वे जीवन रेखाएं हैं जिनका उपयोग जंगली हाथी, गैंडे और अन्य वन्यजीव बाढ़ के दौरान या भोजन की तलाश में एक जंगल से दूसरे जंगल जाने के लिए करते हैं। इन रास्तों पर रिसॉर्ट्स, ढाबों और पत्थर खदानों के निर्माण से न केवल मानव-पशु संघर्ष (Human-Animal Conflict) बढ़ रहा है, बल्कि गैंडों का अस्तित्व भी खतरे में पड़ गया है। पर्यावरणविदों का आरोप है कि राज्य प्रशासन स्थानीय रसूखदार लोगों और खनन माफियाओं को बचाने के लिए जानबूझकर इस मामले को ठंडे बस्ते में डाल रहा है। अब देखना यह है कि सुप्रीम कोर्ट इस प्रशासनिक अवमानना पर क्या कड़ा कदम उठाता है।