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ध्वनि प्रदूषण और ‘प्रेशर हॉर्न’ पर पटना हाईकोर्ट हुआ सख्त: डीजे और कान फोड़ू आवाज़ों पर लगाम कसने के लिए पुलिस को दिए चालान के निर्देश

अभिषेक सिंह
पटना

बिहार में सड़कों पर बेलगाम दौड़ते वाहनों के कान फोड़ू प्रेशर हॉर्न और बेतहाशा बजने वाले डीजे (DJs) अब गुज़रे ज़माने की बात हो सकते हैं। पटना उच्च न्यायालय (Patna High Court) ने राज्य में बेतहाशा बढ़ रहे ध्वनि प्रदूषण (noise pollution) पर बेहद कड़ा और सख्त रुख अख्तियार कर लिया है। आम जनता की परेशानी और सड़क दुर्घटनाओं के बढ़ते मामलों पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए अदालत ने राज्य प्रशासन और पुलिस को त्वरित और कठोर कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं।

पटना हाईकोर्ट ने पूरे राज्य में अनियंत्रित और उच्च-डेसिबल (high-decibel) वाले लाउडस्पीकरों, डीजे और प्रेशर हॉर्न के उपयोग पर लगाम कसने के लिए विस्तृत दिशा-निर्देशों (comprehensive set of statewide directives) का एक सेट जारी किया है। अदालत ने पुलिस अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिया है कि वे ‘मोटर वाहन अधिनियम, 1988’ (Motor Vehicles Act, 1988) की धारा 190(2) के तहत नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ भारी चालान (fines) काटें और दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित करें।

सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर विशेष ज़ोर दिया कि बसों, ट्रकों और मॉडिफाइड बाइकों में इस्तेमाल होने वाले प्रेशर हॉर्न केवल ध्वनि प्रदूषण ही नहीं फैलाते, बल्कि ये सड़क दुर्घटनाओं (road accidents) का एक प्रमुख कारण भी हैं। अचानक और तेज़ आवाज़ से दोपहिया वाहन चालक या पैदल चलने वाले लोग घबरा जाते हैं, जिससे जानलेवा हादसे होते हैं। इसके अलावा, अस्पतालों, स्कूलों और रिहायशी इलाकों में देर रात तक बजने वाले डीजे के कारण आम नागरिकों और बुज़ुर्गों को भारी सार्वजनिक असुविधा (public inconvenience) का सामना करना पड़ता है।

अक्सर देखा गया है कि त्योहारों या शादी-समारोहों के नाम पर ध्वनि प्रदूषण के नियमों की धज्जियां उड़ाई जाती हैं और स्थानीय पुलिस मूकदर्शक बनी रहती है। लेकिन हाईकोर्ट के इस स्पष्ट आदेश के बाद अब प्रशासन की जवाबदेही तय हो गई है। परिवहन विभाग और ट्रैफिक पुलिस को अब सघन जांच अभियान चलाकर प्रेशर हॉर्न ज़ब्त करने होंगे। अदालत का यह आदेश एक शांत, सुरक्षित और सभ्य नागरिक समाज के निर्माण की दिशा में एक बहुत ही ज़रूरी और स्वागत योग्य कदम है।