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छात्र शक्ति के आगे फिर झुकी सरकार: लेफ्ट और CJP के प्रदर्शनों में छात्रों को रोकने वाला विवादित आदेश तमिलनाडु सरकार ने लिया वापस

सरिता त्रिपाठी
चेन्नई

तमिलनाडु में अभिव्यक्ति की आज़ादी और छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर चल रहा प्रशासनिक टकराव अंततः सरकार के बैकफुट पर आने के साथ खत्म हो गया है। भारी विवाद और राजनीतिक दबाव के बाद, तमिलनाडु सरकार ने उस विवादास्पद आदेश को आधिकारिक तौर पर वापस (withdrawn) ले लिया है, जिसमें कॉलेज प्रशासनों को छात्रों को ‘लेफ्ट और CJP’ (Left, CJP) द्वारा आयोजित विरोध प्रदर्शनों में भाग लेने से रोकने का निर्देश दिया गया था।

इस पूरे विवाद की जड़ें हाल ही में राष्ट्रीय स्तर पर हुए बड़े राजनीतिक घटनाक्रमों से जुड़ी हैं। दरअसल, ‘सिटिजन्स जस्टिस प्रोजेक्ट’ (CJP) द्वारा नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर किए गए विशाल छात्र प्रदर्शनों के कारण केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान (Dharmendra Pradhan) को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था। इस बड़ी घटना के कुछ ही दिनों बाद, तमिलनाडु के मुख्य सचिव (Chief Secretary) की अध्यक्षता में हुई ‘कानून व्यवस्था की बैठक’ (Law and Order Meeting) के एजेंडे के आधार पर यह कड़ा निर्देश जारी किया गया था।

सरकार और पुलिस प्रशासन को डर था कि राष्ट्रीय स्तर की यह छात्र क्रांति तमिलनाडु के परिसरों में भी फैल सकती है, जिससे कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ सकती है। आदेश में विशेष रूप से वामपंथी (Left) संगठनों और CJP के विरोध प्रदर्शनों का ज़िक्र किया गया था। जैसे ही यह आदेश सार्वजनिक हुआ, राज्य भर के विश्वविद्यालयों और नागरिक समाज में आक्रोश भड़क उठा।

छात्र नेताओं और मानवाधिकार संगठनों ने इसे ‘अघोषित आपातकाल’ और छात्रों के संवैधानिक अधिकारों का हनन करार दिया। उनका तर्क था कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना लोकतंत्र का मूल आधार है। राज्य में गहराते असंतोष और विपक्षी दलों के तीखे हमलों के बाद सरकार ने अपनी गलती सुधारते हुए इस आदेश को रद्द कर दिया है। यह घटनाक्रम यह स्पष्ट करता है कि आज के जागरूक दौर में छात्रों की राजनीतिक आवाज़ को प्रशासनिक फरमानों के ज़रिए नहीं दबाया जा सकता।