अडानी-शिवकुमार की मुलाकात के बाद कर्नाटक की सियासत में भूचाल: ‘टनल रोड प्रोजेक्ट’ की कानूनी बाधाएं दूर करने के लिए सरकार ने बदले दो कानून

राघवेन्द्र प्रताप सिंह
बेंगलुरु
कर्नाटक की राजनीति और बुनियादी ढांचा विकास (Infrastructure Development) के क्षेत्र में एक बहुत बड़ा और विवादित घटनाक्रम सामने आया है। मशहूर उद्योगपति गौतम अडानी (Gautam Adani) और कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार (D.K. Shivakumar) की मुलाकात के ठीक एक दिन बाद, राज्य सरकार ने बेंगलुरु के बहुचर्चित ‘टनल रोड प्रोजेक्ट’ (Tunnel road project) के रास्ते में आ रही कानूनी बाधाओं को दूर करने के लिए दो अहम कानूनों में संशोधन कर दिया है।
विपक्ष और नागरिक समाज के सदस्यों ने सरकार के इस कदम पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। इस संशोधन की सबसे कड़ी निंदा उन याचिकाकर्ताओं (petitioners) ने की है जो इस प्रोजेक्ट के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। याचिकाकर्ताओं का सीधा आरोप है कि सरकार का यह कदम “पिछली तारीख से उल्लंघनों को नियमित करने” (regularising violations in retrospect) के समान है। उनका तर्क है कि जब कोई प्रोजेक्ट कानूनी मापदंडों पर खरा नहीं उतरा, तो सरकार ने प्रोजेक्ट को रोकने के बजाय रातों-रात कानून ही बदल डाले।
ग़ौरतलब है कि कर्नाटक उच्च न्यायालय (High Court of Karnataka) में इस टनल रोड प्रोजेक्ट को चुनौती देने वाली तीन जनहित याचिकाएं (PILs) पहले से ही लंबित हैं। इन याचिकाओं में स्पष्ट रूप से यह दलील दी गई थी कि यह विशाल इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट मौजूदा पर्यावरणीय और शहरी नियोजन से जुड़े दो कानूनों का खुला उल्लंघन कर रहा है। लेकिन सरकार द्वारा इन कानूनों में ही संशोधन कर दिए जाने से अब यह कानूनी लड़ाई एक नया मोड़ ले चुकी है।
बेंगलुरु शहर लंबे समय से भारी ट्रैफिक जाम की समस्या से जूझ रहा है और राज्य सरकार टनल रोड को इसका अंतिम समाधान बता रही है। लेकिन पर्यावरणविदों का मानना है कि बिना उचित अध्ययन और पब्लिक कंसल्टेशन के ऐसे विशाल प्रोजेक्ट्स शहर की पारिस्थितिकी को बर्बाद कर देंगे। गौतम अडानी की डी.के. शिवकुमार से मुलाकात के तुरंत बाद रातों-रात कानूनी संशोधनों का होना राजनीतिक और प्रशासनिक पारदर्शिता पर कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है, जिसका जवाब सरकार को अदालत और जनता दोनों को देना होगा।