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चीनी की कीमतों में अचानक 40% का भारी उछाल: विपक्ष ने ‘इथेनॉल नीति’ को ठहराया ज़िम्मेदार, आम आदमी की जेब पर सीधा असर

अभिषेक सिंह
नई दिल्ली

देशभर में आम आदमी की रसोई और घरेलू बजट पर महंगाई की एक और तगड़ी मार पड़ी है। बाज़ार में अचानक चीनी (Sugar) की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि दर्ज की गई है, जिसने उपभोक्ताओं, बेकरी मालिकों और चाय दुकानदारों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। खुदरा (Retail) और थोक (wholesale) दोनों बाज़ारों में चीनी के दाम लगभग 40% तक बढ़ गए हैं, जबकि कुछ राज्यों में यह वृद्धि 50% तक दर्ज की गई है।

आंकड़ों के अनुसार, कीमतों में यह उछाल बेहद तेज़ और अप्रत्याशित रहा है। बाज़ार में जो चीनी एक महीने पहले लगभग ₹50.78 प्रति किलोग्राम बिक रही थी, वह एक सप्ताह पहले ₹55 तक पहुंची और अब अचानक उछलकर ₹67.4 प्रति किलोग्राम के स्तर पर आ गई है। इतनी कम अवधि में आवश्यक खाद्य सामग्री की कीमतों में इस तरह की तेज़ वृद्धि ने बाज़ार के अर्थशास्त्रियों को भी चौंका दिया है।

इस भारी मूल्य वृद्धि ने अब एक बड़े राजनीतिक विवाद का रूप ले लिया है। मुख्य विपक्षी दलों ने चीनी की कीमतों में इस आग के लिए सीधे तौर पर केंद्र सरकार की नीतियों को ज़िम्मेदार ठहराया है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार द्वारा गन्ने (sugar cane) का भारी मात्रा में ‘इथेनॉल उत्पादन’ (ethanol production) के लिए डायवर्जन (diversion) किया जाना ही इस कृत्रिम कमी और मूल्य वृद्धि का मुख्य कारण है।

ग़ौरतलब है कि सरकार पेट्रोल में मिलाने के लिए इथेनॉल ब्लेंडिंग (Ethanol Blending) कार्यक्रम को ज़ोर-शोर से बढ़ावा दे रही है, जिसके लिए गन्ने के रस और शीरे का इस्तेमाल किया जाता है। विपक्ष का तर्क है कि स्वच्छ ऊर्जा के लक्ष्यों को हासिल करने की जल्दबाज़ी में सरकार ने खाद्य सुरक्षा और आम जनता की बुनियादी ज़रूरतों को नज़रअंदाज़ कर दिया है, जिसके कारण बाज़ार में चीनी की आपूर्ति कम हो गई है।

आगामी त्योहारी सीज़न को देखते हुए चीनी की यह महंगाई आम जनता के लिए एक बड़ा सिरदर्द बनने वाली है। मिठाई, बेकरी उत्पाद और पैकेटबंद खाद्य पदार्थों की कीमतों पर भी इसका ‘चेन रिएक्शन’ (Chain reaction) देखने को मिलेगा। अब देखना यह है कि सरकार बाज़ार में चीनी की आपूर्ति बढ़ाने और आसमान छूती कीमतों पर अंकुश लगाने के लिए क्या प्रशासनिक कदम उठाती है, या क्या वह इथेनॉल डायवर्जन के कोटे में कोई कटौती करती है।