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‘न्यायिक व्यवस्था की विफलता’: 45 साल पुराने डबल मर्डर केस में सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी, 70 वर्षीय दोषी को दी रिहाई

नई दिल्ली: ( विवेक ओझा) : “जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड” (न्याय में देरी, न्याय न मिलने के समान है)— यह कहावत भारतीय न्याय प्रणाली पर एक बार फिर बिल्कुल सटीक बैठी है। सुप्रीम कोर्ट ने 45 साल पुराने एक दोहरे हत्याकांड (Double Murder Case) के मामले की सुनवाई करते हुए न्यायपालिका की कार्यप्रणाली पर बेहद सख्त और चौंकाने वाली टिप्पणी की है। अदालत ने मामले में हुई असाधारण देरी को ‘न्यायिक व्यवस्था की विफलता’ (Failure of judicial system) करार देते हुए, एकमात्र जीवित 70 वर्षीय बीमार दोषी की सजा को निलंबित कर दिया है और उसे तत्काल जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है।

क्या है 45 साल पुराना यह मामला?
यह हैरान कर देने वाला मामला झारखंड (घटना के समय अविभाजित बिहार) का है, जहां साल 1981 में यह दोहरा हत्याकांड हुआ था। इस जघन्य अपराध में कुल छह लोगों को आरोपी बनाया गया था।
कानून की सुस्त चाल का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस केस में ट्रायल कोर्ट (निचली अदालत) को सुनवाई पूरी कर फैसला सुनाने में ही पूरे 22 साल लग गए। 1991 में आरोप तय होने के बाद 2002 में निचली अदालत ने फैसला सुनाया। इसके बाद जब इस फैसले को झारखंड हाई कोर्ट में चुनौती दी गई, तो हाई कोर्ट ने भी अपील का निपटारा करने में 22 साल और लगा दिए। इस तरह 1981 की घटना का अंतिम निर्णय आने में करीब 45 साल का वक्त बीत गया। इस लंबी और उबाऊ कानूनी लड़ाई के दौरान छह में से पांच आरोपियों की मौत हो गई।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए गहरी निराशा व्यक्त की। पीठ ने कहा कि यह न्याय प्रणाली की विफलता को दर्शाता है, जिसमें एक गंभीर अपराध की सजा ठीक से नहीं मिल पाई और आरोपियों को बिना किसी ठोस नतीजे के 22 साल तक ट्रायल की प्रताड़ना झेलनी पड़ी। इसके बाद अपील के लिए उन्हें दो दशक से अधिक समय तक इंतजार करना पड़ा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “हम इस दोहरे हत्याकांड की गंभीरता को समझते हैं, लेकिन पिछले 45 वर्षों में आरोपी द्वारा झेली गई कानूनी प्रताड़ना को भी नजरअंदाज नहीं कर सकते।”

एकमात्र जीवित दोषी को मिली जमानत
इस मामले में जीवित बचा एकमात्र दोषी अब 70 वर्ष का बुजुर्ग हो चुका है और गंभीर बीमारियों के कारण अस्पताल में बिस्तर पर (Bed-ridden) है। दोषी की वकील फौजिया शकील की दलीलों और राज्य सरकार के हलफनामे को संज्ञान में लेते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने दोषी के खराब स्वास्थ्य के मद्देनजर उसे तत्काल निजी मुचलके (Personal Surety) पर रिहा करने का आदेश दिया है। यह भी सामने आया कि इतने लंबे केस में दोषी ने कुल मिलाकर मात्र 2 साल, 4 महीने और 12 दिन ही कस्टडी में बिताए थे।

जवाब-तलब और हाई कोर्ट पर उठे सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल से इस अप्रत्याशित देरी का स्पष्टीकरण मांगा था। जवाब में बताया गया कि शुरुआती 6 साल तक आरोपी फरार थे। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया कि 1991 में आरोप तय होने के बाद भी ट्रायल खत्म होने में 12 साल क्यों लगे? और हाई कोर्ट में 22 साल तक अपील क्यों लंबित रही?

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला और उसकी सख्त टिप्पणी देश की आपराधिक न्याय प्रणाली में मुकदमों के बढ़ते बोझ और पेंडेंसी की कड़वी सच्चाई को उजागर करती है। 45 साल तक चला यह मुकदमा इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि सिस्टम की लेटलतीफी कैसे न्याय के मूल उद्देश्य को ही खत्म कर देती है।