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‘प्राइवेट कंपनियां कर रहीं पर्सनल डेटा का गलत इस्तेमाल’, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को दिए लगाम लगाने के सख्त निर्देश

अभिषेक सिंह
नई दिल्ली: आज के डिजिटल युग में व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा (Data Privacy) एक बड़ी और गंभीर चुनौती बन गई है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने निजी कंपनियों द्वारा आम लोगों के व्यक्तिगत और संवेदनशील डेटा—जैसे प्रोविडेंट फंड (PF) और आयकर रिटर्न (Income Tax)—तक अनधिकृत पहुंच और उसके दुरुपयोग पर गहरी चिंता व्यक्त की है। सर्वोच्च अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह तकनीकी और डोमेन विशेषज्ञों (Domain Experts) की मदद से इस गंभीर समस्या का जल्द से जल्द समाधान निकाले और डेटा के इस तरह के खुले व्यावसायिक इस्तेमाल पर रोक लगाए।

क्या है पूरा मामला?
यह महत्वपूर्ण टिप्पणी और निर्देश सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने पीयूष शर्मा नामक व्यक्ति द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए दिए। याचिकाकर्ता ने कोर्ट के सामने यह चिंताजनक तथ्य रखा था कि निजी कंपनियां बिना किसी उचित अनुमति के लोगों के वित्तीय और रोजगार संबंधी वैधानिक रिकॉर्ड्स (EPFO/UAN और PAN से जुड़ा डेटा) का अंधाधुंध इस्तेमाल कर रही हैं।

बिना OTP और सहमति के डेटा तक पहुंच
याचिका में बताया गया कि प्राइवेट वेरिफिकेशन कंपनियां और डिजिटल इकोसिस्टम महज पैन (PAN) और यूएएन (UAN) नंबर डालकर किसी भी व्यक्ति की पूरी एंप्लॉयमेंट हिस्ट्री (नौकरी का इतिहास) और वित्तीय जानकारी आसानी से निकाल रहे हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया में डेटा के मूल मालिक (आम नागरिक) के पास कोई ओटीपी (OTP) जनरेट नहीं होता है, और न ही उसकी कोई स्पष्ट सहमति (Explicit Consent) ली जाती है।

याचिकाकर्ता ने स्पष्ट किया कि प्राइवेट कंपनियां इस डेटा का उपयोग बैकग्राउंड वेरिफिकेशन (Background Verification), मूनलाइटिंग (Moonlighting) पकड़ने, डुअल एंप्लॉयमेंट स्क्रीनिंग और लेबर मार्केट प्रोफाइलिंग जैसे व्यावसायिक कामों के लिए कर रही हैं, जो सीधे तौर पर लोगों की निजता के अधिकार का उल्लंघन है।

सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देश और 4 महीने का अल्टीमेटम
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को स्वीकार करते हुए कहा कि कानून के तहत सरकारी एजेंसियों को दिए गए व्यक्तिगत और संप्रभु (Sovereign) डेटा तक प्राइवेट संस्थाओं की इस तरह मनमानी पहुंच बेहद चिंताजनक है। हालांकि, कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि यह मुख्य रूप से एक नीतिगत (Policy) मामला है। इसलिए, अदालत ने जनहित याचिका का निपटारा करते हुए केंद्र सरकार और संबंधित आधिकारिक विभागों को निर्देश दिया है कि वे याचिकाकर्ता की विस्तृत चिंताओं का संज्ञान लें। कोर्ट ने सरकार से कहा है कि वह विशेषज्ञों की टीम बनाकर 4 महीने के भीतर इस पर कोई ठोस फैसला ले और आवश्यक कदम उठाए।

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश आम आदमी के अधिकारों की रक्षा के लिए एक बड़ा कदम है। यह मामला स्पष्ट करता है कि तकनीकी विकास के साथ-साथ डेटा सुरक्षा के लिए कड़े ‘फायरवॉल’ की तत्काल आवश्यकता है। उम्मीद की जा रही है कि केंद्र सरकार जल्द ही ऐसा मजबूत तंत्र विकसित करेगी, जिससे सरकारी संस्थाओं के पास मौजूद नागरिकों का गोपनीय डेटा निजी कंपनियों के हाथों का खिलौना न बन सके।