संगीत की खोई हुई विरासत : 1800 साल पुरानी मां सरस्वती की मूर्ति बनी चर्चा का केंद्र

नई दिल्ली ( सरिता त्रिपाठी ):भारत का इतिहास, इसकी कला और संस्कृति सदियों पुरानी है। समय-समय पर मिलने वाली पुरातात्विक धरोहरें हमें हमारे उस गौरवशाली अतीत की याद दिलाती हैं, जिस पर हर भारतीय को गर्व है। हाल ही में, विद्या, कला और संगीत की देवी मां सरस्वती की 1800 साल पुरानी एक दुर्लभ मूर्ति चर्चा का प्रमुख केंद्र बनी हुई है। यह प्राचीन मूर्ति न केवल उस दौर की उत्कृष्ट मूर्तिकला का एक बेजोड़ नमूना है, बल्कि यह भारतीय संगीत की उस ‘खोई हुई विरासत’ के कई गहरे राज भी खोलती है, जिनके तार सीधे हमारे प्राचीन इतिहास से जुड़े हैं।
ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व :
करीब 1800 वर्ष पुरानी होने का अर्थ है कि यह मूर्ति लगभग दूसरी या तीसरी शताब्दी (कुषाण या प्रारंभिक गुप्त काल) के आसपास की है। यह वह स्वर्णिम दौर था जब भारत में कला, साहित्य और संस्कृति अपने चरम पर थी। इस काल की मूर्तियों में आध्यात्मिक शांति और सांस्कृतिक संपन्नता का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। पुरातत्वविदों और इतिहासकारों के लिए यह मूर्ति किसी खजाने से कम नहीं है, क्योंकि यह उस समय के समाज में शिक्षा और विशेषकर संगीत के उच्च स्थान को स्पष्ट रूप से दर्शाती है।
मूर्ति में छिपे संगीत की प्राचीन विरासत के राज :
इस प्राचीन मूर्ति की सबसे बड़ी खासियत इसका संगीत से जुड़ा होना है। मां सरस्वती को आदिकाल से ‘वीणा वादिनी’ के रूप में पूजा जाता रहा है। विशेषज्ञों और संगीत शास्त्रियों के लिए यह मूर्ति इसलिए खास है क्योंकि इसमें उकेरा गया वाद्य यंत्र आज के आधुनिक वाद्य यंत्रों से काफी अलग है:
- वाद्य यंत्र की अनूठी बनावट: मूर्ति में देवी द्वारा वाद्य यंत्र (प्राचीन वीणा) को पकड़ने की विशेष मुद्रा और उसकी बनावट से प्राचीन भारतीय संगीत शास्त्र की कई तकनीकी जानकारियां सामने आती हैं।
- तारों का विज्ञान: इससे यह समझने में मदद मिलती है कि 1800 साल पहले ध्वनियों, श्रुतियों और सुरों को साधने के लिए किस प्रकार के तंतु वाद्यों (String Instruments) का प्रयोग किया जाता था।
संगीत के विकास का साक्ष्य: यह मूर्ति कला और संगीत शोधकर्ताओं के लिए एक ‘टाइम मशीन’ की तरह है, जो यह बताती है कि सदियों के सफर में हमारे पारंपरिक वाद्य यंत्रों का स्वरूप कैसे बदला और विकसित हुआ।
मूर्तिकला की अद्भुत बारीकी
उस काल के कारीगरों ने सचमुच पत्थरों में जान फूंकने का काम किया था। देवी सरस्वती के आभूषण, उनके वस्त्रों की महीन सिलवटें और चेहरे पर उकेरा गया शांत एवं सौम्य भाव उस दौर की मूर्तिकला की उन्नत तकनीक को प्रमाणित करता है। सदियों के थपेड़े सहने के बावजूद, मूर्ति की भाव-भंगिमा में संगीत और लय का जो अहसास झलकता है, वह इसे कला के दृष्टिकोण से अनमोल बना देता है।
मां सरस्वती की यह 1800 साल पुरानी मूर्ति सिर्फ एक ऐतिहासिक पत्थर की आकृति नहीं है, बल्कि यह हमारे पूर्वजों की कलात्मक और संगीतमय सोच का एक जीवंत दस्तावेज है। ऐसी धरोहरें हमें यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि सदियों पहले भी भारत में संगीत और ध्वनि का विज्ञान कितना अधिक उन्नत था। हमारी जिम्मेदारी है कि हम इस अमूल्य विरासत को सहेजें, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपने समृद्ध और सुरीले इतिहास पर गर्व कर सकें।