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क्या है ग्लेशियर कॉलैप्स, जिसने नेपाल में मचाई भयंकर तबाही? समझिए कैसे टूटती है बर्फ की पहाड़

काठमांडू। नेपाल के रसुवा जिले में बुधवार, 26 अगस्त को आई भीषण फ्लैश फ्लड ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई है। इस प्राकृतिक आपदा में अब तक 160 से अधिक लोगों की मौत की खबर सामने आई है, जबकि सैकड़ों लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। लापता लोगों में बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक भी शामिल हैं। इस बीच, फ्लैश फ्लड की वजह को लेकर ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा टूटने और नीचे गिरने की थ्योरी सामने आई है।सैटेलाइट तस्वीरों के शुरुआती विश्लेषण से संकेत मिले हैं कि ग्लेशियर का निचला हिस्सा करीब 5,200 मीटर की ऊंचाई से टूटकर लगभग 1,200 मीटर नीचे घाटी में जा गिरा। इसके बाद बर्फ, चट्टानों और भारी मलबे का विशाल सैलाब नीचे की ओर आया। विशेषज्ञ इसे ग्लेशियर कॉलैप्स-आइस रॉक एवलॉन्च की घटना मान रहे हैं।बर्फ और चट्टानों के सैलाब से आई विनाशकारी बाढ़ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा टूटकर नीचे गिरने के दौरान अपने साथ भारी मात्रा में चट्टान, मिट्टी और मलबा लेकर आया। इससे नदी में अचानक पानी, बोल्डर और मलबे का बेहद तेज बहाव पैदा हुआ और रसुवा क्षेत्र में विनाशकारी फ्लैश फ्लड आ गई।बाढ़ की वजह से घरों, सड़कों और पुलों को भारी नुकसान पहुंचा है। बड़ी संख्या में लोग अब भी लापता हैं। राहत और बचाव एजेंसियां प्रभावित इलाकों में फंसे लोगों को सुरक्षित निकालने के लिए लगातार अभियान चला रही हैं। भारत भी नेपाल के राहत और बचाव प्रयासों में मदद कर रहा है।ग्लेशियर कॉलैप्स में भूकंप की कितनी भूमिका?घटना के तुरंत बाद शुरुआती तौर पर भूकंप को फ्लैश फ्लड की संभावित वजह माना गया था। हालांकि, बाद में अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) ने संकेत दिया कि जिस भूकंपीय गतिविधि को शुरुआत में भूकंप समझा गया, वह ग्लेशियर, चट्टानों और बर्फ के टूटकर नीचे गिरने तथा मलबे के तेज बहाव से पैदा हुई भूकंपीय ऊर्जा भी हो सकती है।नेपाल के भू-वैज्ञानिक प्रकाश पोखरेल ने भी कहा कि शुरुआती संकेतों में भूकंप को संभावित ट्रिगर माना गया था, लेकिन अभी यह स्पष्ट नहीं है कि वास्तव में भूकंप ने इस तबाही को जन्म दिया था या नहीं।अब तक उपलब्ध सैटेलाइट तस्वीरों से यह संकेत जरूर मिल रहा है कि फ्लैश फ्लड के पीछे बर्फ और चट्टानों के बड़े पैमाने पर नीचे गिरने की अहम भूमिका रही।क्या होता है ग्लेशियर कॉलैप्स?ग्लेशियर पहाड़ों पर हजारों वर्षों में जमा हुई बर्फ की विशाल परत होती है, जो धीरे-धीरे नीचे की ओर खिसकती रहती है। जब तापमान बढ़ने, बर्फ तेजी से पिघलने, बारिश, चट्टानों के कमजोर होने या भूकंपीय गतिविधि जैसी परिस्थितियों के कारण ग्लेशियर का कोई हिस्सा अस्थिर हो जाता है, तो उसका बड़ा हिस्सा अचानक टूटकर नीचे गिर सकता है।ऊंचाई से गिरते समय बर्फ अपने साथ चट्टान, मिट्टी और दूसरे मलबे को भी बहा ले जाती है। इससे नीचे की घाटी में बेहद तेज रफ्तार वाला आइस-रॉक एवलॉन्च पैदा हो सकता है, जो रास्ते में आने वाली बस्तियों और बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा सकता है।नेपाल में हुई घटना में भी टूटे हुए बर्फ के बड़े हिस्से के साथ चट्टान और मिट्टी का मलबा नीचे आया और इसके बाद नदी में अचानक तेज बहाव पैदा हुआ।विशेषज्ञों ने क्या कहा?सिक्किम यूनिवर्सिटी के इंजीनियरिंग जियोलॉजी विशेषज्ञ विक्रम गुप्ता ने सैटेलाइट तस्वीरों के आकलन के आधार पर बताया कि ग्लेशियर के निचले हिस्से का बड़ा भाग टूटकर नीचे गिरना घटना की शुरुआती वजह के तौर पर दिखाई दे रहा है। इस प्रक्रिया में ग्लेशियर के साथ बड़ी मात्रा में चट्टान भी बहाव में शामिल हुई।वहीं, यूनिवर्सिटी ऑफ कैलगरी के अर्थ साइंटिस्ट डैन शुगर के अनुसार, सैटेलाइट तस्वीरों में हादसे से पहले के 24 घंटों के दौरान बर्फ के बड़े पैमाने पर पिघलने के संकेत मिले हैं। उनके मुताबिक, घटना से एक दिन पहले कई ग्लेशियर बर्फ से ढके दिखाई दे रहे थे, जबकि अगले दिन वहां काफी मात्रा में खुली बर्फ नजर आई।उन्होंने यह भी बताया कि करीब 5,200 मीटर की ऊंचाई पर ग्लेशियर का निचला हिस्सा टूटकर लगभग 1,200 मीटर नीचे घाटी में गिरा। उनके अनुसार, इलाके में निर्माण गतिविधियां भी संभावित कारणों में शामिल हो सकती हैं। इसके अलावा जलवायु परिवर्तन की भूमिका से भी इनकार नहीं किया जा सकता।क्या इसे GLOF भी माना जा सकता है?नेपाल में हुई घटना को लेकर जांच अभी जारी है। उपलब्ध सैटेलाइट तस्वीरों के आधार पर फिलहाल इसे ग्लेशियर कॉलैप्स से पैदा हुई आइस-रॉक एवलॉन्च की घटना माना जा रहा है।हालांकि, कुछ लोगों ने इसे ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) की संभावना से भी जोड़ा है। GLOF तब होती है जब ग्लेशियर के पास बनी झील का प्राकृतिक बांध टूट जाता है और उसमें जमा पानी अचानक भारी मात्रा में बाहर निकलता है।लेकिन अभी तक सामने आए आकलन में नेपाल की इस घटना को मुख्य रूप से ग्लेशियर कॉलैप्स और उससे पैदा हुए बर्फ-चट्टान के सैलाब से जुड़ा माना जा रहा है।बाढ़ में 133 भारतीयों समेत 750 से अधिक लोग लापतानेपाल में आई इस आपदा में 133 भारतीय नागरिकों समेत 750 से अधिक लोगों के लापता होने की जानकारी सामने आई है। प्रभावित इलाकों में संचार व्यवस्था भी बुरी तरह प्रभावित हुई है, जिससे लापता लोगों की सही स्थिति का पता लगाने में बचाव दलों को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।नेपाल में राहत और बचाव अभियान लगातार जारी है। अधिकारियों को आशंका है कि मृतकों और लापता लोगों की संख्या में अभी और बदलाव हो सकता है।भारत ने जारी किए हेल्पलाइन नंबरआपदा को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल के प्रधानमंत्री से फोन पर बात कर हालात की जानकारी ली और उन्हें हरसंभव मानवीय सहायता का भरोसा दिया। भारत की ओर से नेपाल के लिए राहत सामग्री की पहली खेप भी भेजी गई है।काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास ने प्रभावित भारतीय नागरिकों और उनके परिवारों की सहायता के लिए हेल्पलाइन नंबर जारी किए हैं। भारतीय नागरिक +977 985 131 6807 और +977 970 910 7500 पर संपर्क कर सकते हैं।भारतीय दूतावास ने कहा है कि वह बाढ़ प्रभावित भारतीय नागरिकों के जल्द बचाव और राहत के लिए नेपाल सरकार के संबंधित अधिकारियों के लगातार संपर्क में है।नेपाल ने भी जारी किए इमरजेंसी नंबरनेपाल पर्यटन बोर्ड ने भी आपदा प्रभावित लोगों और पर्यटकों की सहायता के लिए टोल-फ्री इमरजेंसी नंबर 1234, हॉटलाइन 1144 और पर्यटक पुलिस नंबर 9851289445 जारी किया है।इसके अलावा बीजिंग स्थित भारतीय दूतावास ने भी सहायता के लिए 0086 185 1428 4905 हेल्पलाइन नंबर जारी किया है। इस नंबर पर व्हाट्सऐप के जरिए भी संपर्क किया जा सकता है।फिलहाल नेपाल में राहत और बचाव अभियान युद्धस्तर पर जारी है और एजेंसियां लापता लोगों की तलाश के साथ-साथ प्रभावित इलाकों में फंसे लोगों तक राहत पहुंचाने में जुटी हैं।