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बड़ा कदम: मोदी कैबिनेट ने ‘समुद्र मंथन’ योजना को दी मंजूरी, 84,084 करोड़ से खोजा जाएगा गहरा समुद्री तेल

भारत को ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने और कच्चे तेल की बढ़ती आयात निर्भरता को कम करने के लिए केंद्र सरकार ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के तहत ‘समुद्र मंथन’ यानी ‘नेशनल ऑफशोर एक्सप्लोरेशन स्कीम’ (National Offshore Exploration Scheme) का साल-दर-साल का पूरा रोडमैप तैयार किया जा रहा है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट द्वारा मंजूरी दी गई इस योजना के तहत समुद्र तल के नीचे छिपे लगभग 600 मिलियन मीट्रिक टन (करीब 60 करोड़ टन) कच्चे तेल के बराबर ऊर्जा भंडार का पता लगाने का लक्ष्य रखा गया है। योजना के पहले चरण में वित्त वर्ष 2030-31 तक कुल 84,084 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे।आयात निर्भरता कम करने और एनर्जी सिक्योरिटी मजबूत करने की कवायदभारत वर्तमान में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल उपभोक्ता देश है। देश का सालाना तेल आयात बिल लगभग 144 अरब डॉलर (करीब 13 लाख करोड़ रुपये) तक पहुंच चुका है। बीते एक दशक में भारत की कच्चे तेल पर आयात निर्भरता 77 प्रतिशत से बढ़कर 88 प्रतिशत के खतरनाक स्तर तक पहुंच गई है। इसके अलावा, देश की प्राकृतिक गैस की करीब आधी जरूरतें भी विदेशी आयात से ही पूरी होती हैं।इस स्थिति से निपटने और भारत की ‘एनर्जी सिक्योरिटी’ को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से सरकार ने इस महाअभियान की नींव रखी है, ताकि देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ रहे भारी दबाव को कम किया जा सके।3,000 मीटर गहरे समुद्र में छिपा है 5,600 MTOE का विशाल खजानाभारतीय समुद्री सीमा के पूर्वी और पश्चिमी ऑफशोर बेसिन, जो 3,000 मीटर की गहराई तक फैले हैं, हाइड्रोकार्बन के समृद्ध स्रोत माने जाते हैं। भूवैज्ञानिक अनुमानों के मुताबिक, इन गहरे समुद्री क्षेत्रों में 5,600 मिलियन मीट्रिक टन ऑयल इक्विवेलेंट (MTOE) से अधिक का हाइड्रोकार्बन भंडार मौजूद है।हालांकि, डीपवाटर ड्रिलिंग (गहरे पानी में उत्खनन) तकनीकी रूप से काफी जटिल, अत्यधिक महंगी और जोखिम भरी प्रक्रिया है। एक सिंगल गहरे समुद्री कुएं (Well) की ड्रिलिंग पर ही 125 से 150 मिलियन डॉलर का भारी-भरकम खर्च आता है। इसके अलावा, एक्सप्लोरेशन ब्लॉक मिलने से लेकर व्यावसायिक उत्पादन (Commercial Production) शुरू होने में 5 से 10 साल का लंबा समय लग जाता है।कंपनियों के जोखिम को बांटेगी सरकार, प्राइवेट-पब्लिक पार्टनरशिप को बढ़ावाअब तक भारी वित्तीय जोखिम और अनिश्चितता के कारण प्राइवेट और सरकारी—दोनों ही कंपनियां इतने गहरे समुद्र में उतरने से कतराती रही हैं। ‘समुद्र मंथन’ योजना के माध्यम से केंद्र सरकार कंपनियों के इसी वित्तीय जोखिम को शेयर (साझा) करेगी।सरकार द्वारा दी जाने वाली बजटीय सहायता से ऑफशोर एक्सप्लोरेशन में कंपनियों की भागीदारी बढ़ेगी, जिससे देश के विशाल समुद्री ऊर्जा संसाधनों को निकालने का रास्ता साफ होगा और भारत ऊर्जा के मामले में स्वावलंबी बनने की दिशा में आगे बढ़ेगा।