तमिलनाडु सरकार की ‘स्वर्ण अंगूठी योजना’ पर डॉक्टरों ने उठाए सवाल: कहा- उच्च सुरक्षा और रसद लागत से खजाने पर पड़ेगा भारी बोझ

अभिषेक सिंह/ चेन्नई: तमिलनाडु में नवजात शिशुओं के कल्याण और परिवारों को सौगात देने के उद्देश्य से शुरू की गई एक महत्वाकांक्षी योजना प्रशासनिक और आर्थिक चुनौतियों के घेरे में आ गई है। राज्य सरकार द्वारा नवजात शिशुओं (newborn babies) के लिए घोषित ‘सोने की अंगूठी योजना’ (Gold ring scheme) को लेकर सरकारी डॉक्टरों के एक प्रमुख संगठन ने उच्च सुरक्षा (high security) और रसद लागत (logistics costs) को लेकर गंभीर चिंताएं व्यक्त की हैं।
इस योजना के भारी-भरकम पैमाने का अंदाज़ा सरकारी आदेश (G.O.) में दिए गए आंकड़ों से लगाया जा सकता है। राज्य सरकार ने एक ग्राम सोने की अंगूठियों (one-gram gold rings) की खरीद के लिए ₹750.83 करोड़ का भारी बजट आवंटित किया है। यह राशि 4,41,667 डिलीवरी (deliveries) के लिए ₹17,000 प्रति लाभार्थी के हिसाब से तय की गई है।
हालाँकि, डॉक्टरों के संघ ‘एसडीपीजीए’ (SDPGA) ने इस योजना के क्रियान्वयन मॉडल पर सवाल खड़े किए हैं।
- प्रस्तावित ‘हब-एंड-स्पोक मॉडल’ (hub-and-spoke model) के ज़िला-स्तरीय लागत विश्लेषण में, SDPGA ने पाया कि इस ‘अस्पताल-आधारित व्यवस्था’ (hospital-based arrangement) को लागू करने की लागत सरकारी आदेश में निर्धारित राज्य-व्यापी प्रशासनिक मानदंडों की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक हो सकती है।
- सरकारी डॉक्टरों के संगठन का यह भी स्पष्ट तर्क है कि रसद (logistics) का प्रबंधन करना स्वास्थ्य विभाग की ‘मुख्य दक्षताओं’ (core competencies) का हिस्सा नहीं है।
यह विरोध इस बात को रेखांकित करता है कि लोकलुभावन योजनाएं केवल बजट आवंटित करने तक सीमित नहीं होतीं, बल्कि उन्हें ज़मीन पर उतारने में भारी प्रशासनिक और सुरक्षा चुनौतियां होती हैं। अस्पतालों में करोड़ों रुपये के सोने के सुरक्षित भंडारण और वितरण के लिए अतिरिक्त सुरक्षा बलों और लॉजिस्टिक चैन की आवश्यकता होगी। यदि योजना की लागत अनुमान से तीन गुना अधिक होती है, तो यह राज्य के स्वास्थ्य बजट और बुनियादी ढांचे पर एक अनावश्यक दबाव डाल सकती है।