मतदाता सूची पुनरीक्षण पर गंभीर सवाल: कर्नाटक और तेलंगाना के ड्राफ्ट SIR रोल में नामों को हटाने में अनियमितता के संकेत

विवेक ओझा
बेंगलुरु
किसी भी जीवंत और स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतदाता सूचियों की शत-प्रतिशत शुद्धता एक स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की सबसे महत्वपूर्ण रीढ़ होती है। हालांकि, हाल ही में कर्नाटक और तेलंगाना में प्रकाशित विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) मतदाता सूचियों में किए गए नाम विलोपन के मामलों ने बेहद गंभीर और चिंताजनक सवाल खड़े कर दिए हैं। हालिया SIR में किए गए विलोपन (Deletions) यह सुझाव देते हैं कि नामों को हटाने के कारणों को मनमाने ढंग से लागू किया गया है। यह स्थिति चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाती है।
दक्षिण भारत के इन दो प्रमुख राज्यों से सामने आए आंकड़े और मसौदे विशेष रूप से चिंताजनक हैं। कर्नाटक और तेलंगाना में, ड्राफ्ट SIR रोल से पता चलता है कि जिन विलोपनों के लिए कारणों को ‘शिफ्टेड’ (स्थानांतरित) और ‘एब्सेंट’ (अनुपस्थित) के रूप में चिह्नित किया गया था, उन्हें बेहद अनियमित (erratically) ढंग से लागू किया गया है। इसका सीधा अर्थ यह है कि कई वास्तविक मतदाताओं के नाम बिना किसी ठोस ज़मीनी सत्यापन या उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना ही सूची से बाहर कर दिए गए हैं। ‘शिफ्टेड’ और ‘एब्सेंट’ जैसे टैग्स का बिना जांच के इस्तेमाल करना प्रशासन की घोर लापरवाही को दर्शाता है।
मतदाता सूची अद्यतनीकरण के दौरान जो प्रक्रिया निर्धारित है, उसके अनुसार बूथ लेवल अधिकारी (BLOs) हर घर का दौरा करते हैं और प्रगणन फॉर्म (enumeration forms) वितरित करते हैं। यह घर-घर जाकर किया जाने वाला सत्यापन ही SIR का मुख्य आधार होता है। लेकिन कर्नाटक और तेलंगाना के ड्राफ्ट रोल्स का यह डेटा इंगित करता है कि अधिकारियों ने इस ज़मीनी प्रक्रिया को बेहद सतही तौर पर लिया है।
इस तरह की ‘मनमानी छंटनी’ हज़ारों-लाखों नागरिकों को उनके सबसे बड़े संवैधानिक अधिकार—यानी मतदान के अधिकार—से वंचित कर सकती है। चुनाव आयोग की सख्त गाइडलाइंस के अनुसार, किसी भी मतदाता का नाम काटने से पहले उसे नोटिस देना और सुनवाई का मौका देना अनिवार्य है। नागरिक समाज के सदस्यों, डेटा विश्लेषकों और राजनीतिक दलों द्वारा अब चुनाव आयोग पर यह भारी दबाव बनाया जा रहा है कि अंतिम मतदाता सूची के प्रकाशन से पहले इन सभी अनियमितताओं की निष्पक्ष और उच्च-स्तरीय जांच हो। यदि इस डेटा विसंगति को समय रहते नहीं सुधारा गया, तो यह आगामी चुनावों की वैधता को कानूनी चुनौती के घेरे में ला सकता है।