मराठी भाषा के मुद्दे पर महाराष्ट्र सरकार में दरार: सीएम फडणवीस के ‘एकतरफा’ फैसले से शिवसेना खफा

अभिषेक सिंह
मुंबई
महाराष्ट्र की गठबंधन राजनीति में एक बार फिर से खींचतान और वैचारिक मतभेदों की दरारें सतह पर आ गई हैं। ‘मराठी मानुष’ और क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति करने वाली शिवसेना एक बार फिर अपने ही गठबंधन के सहयोगी और राज्य के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के एक अहम फैसले से बेहद खफा नज़र आ रही है। यह पूरा विवाद राज्य में कमर्शियल ऑटो रिक्शा और टैक्सी चालकों के लिए मराठी भाषा की अनिवार्यता से जुड़ा है, जिस पर मुख्यमंत्री द्वारा दी गई ढील ने शिवसेना के भीतर भारी बेचैनी पैदा कर दी है।
विवाद की शुरुआत तब हुई जब शिवसेना के वरिष्ठ नेता और महाराष्ट्र सरकार में परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक ने एक बेहद कड़े अभियान की घोषणा की थी। परिवहन मंत्री ने स्पष्ट निर्देश जारी किए थे कि राज्य में व्यावसायिक ऑटो रिक्शा और टैक्सी चलाने वाले सभी चालकों को ‘कार्यात्मक मराठी’ (Functional Marathi) बोलनी आनी चाहिए। शिवसेना का यह कदम उनके पारंपरिक वोट बैंक को साधने और मुंबई व अन्य शहरों में स्थानीय मराठी भाषी युवाओं के लिए रोज़गार के अवसर सुरक्षित करने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा था। मंत्री ने इस नियम को कड़ाई से लागू करने और इसका पालन न करने वालों के परमिट रद्द करने तक की चेतावनी दे दी थी।
लेकिन, इस कड़े फरमान के कुछ ही दिनों बाद, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने गुरुवार को एक बड़ी घोषणा कर दी जिसने शिवसेना की पूरी योजना पर पानी फेर दिया। मुख्यमंत्री फडणवीस ने ऐलान किया कि राज्य सरकार चालकों को मराठी भाषा सीखने के लिए पूरे एक वर्ष का समय देगी और इस एक वर्ष की अवधि के दौरान गैर-अनुपालन (non-compliance) के लिए किसी भी चालक के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी। मुख्यमंत्री का यह फैसला मुंबई में रहने वाले लाखों उत्तर भारतीय और प्रवासी टैक्सी व ऑटो चालकों के लिए एक बड़ी राहत बनकर आया, जो इस नए नियम से अपनी आजीविका छिनने को लेकर भारी खौफ में थे।
हालांकि, मुख्यमंत्री के इस ‘एकतरफा फैसले’ (unilateral decision) ने शिवसेना के नेताओं को आगबबूला कर दिया है। शिवसेना के शीर्ष सूत्रों का कहना है कि इतने महत्वपूर्ण और भावनात्मक नीतिगत फैसले को पलटने से पहले उन्हें ‘भरोसे में नहीं लिया गया’ (Not taken into confidence)। शिवसेना के लिए मराठी भाषा का मुद्दा उनके राजनीतिक अस्तित्व का मूल आधार है। पार्टी नेताओं का तर्क है कि बाहरी प्रवासियों को इतनी लंबी छूट देने से स्थानीय लोगों में गलत संदेश जाएगा और भाषा संरक्षण का मूल उद्देश्य ही विफल हो जाएगा।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस विवाद के पीछे एक गहरी चुनावी रणनीति काम कर रही है। जहां शिवसेना अपने कट्टर ‘मराठी’ वोट बैंक को किसी भी कीमत पर खिसकने नहीं देना चाहती, वहीं भारतीय जनता पार्टी (BJP) का ध्यान मुंबई और महानगर क्षेत्र (MMR) में रहने वाले एक विशाल प्रवासी वोट बैंक (विशेषकर उत्तर भारतीय मतदाताओं) पर केंद्रित है। भाजपा किसी भी कीमत पर इन प्रवासी मतदाताओं को नाराज़ नहीं करना चाहती। आगामी विधानसभा चुनावों के नज़दीक आते ही दोनों दलों के बीच ऐसे ‘क्रेडिट लेने’ और ‘वोट बैंक बचाने’ के संघर्षों में और भी अधिक तीव्रता आने की पूरी संभावना है। फिलहाल, ऑटो और टैक्सी यूनियनों ने मुख्यमंत्री के इस फैसले का ज़ोरदार स्वागत किया है, लेकिन राज्य सचिवालय के गलियारों में इस फैसले ने गठबंधन की गांठों को और उलझा दिया है।