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कर्नाटक की मतदाता सूची से एक झटके में काटे गए 1.07 करोड़ नाम: चुनाव आयोग के इस ‘सफाई अभियान’ पर उठे गंभीर सवाल

विवेक ओझा
बेंगलुरु

लोकतंत्र के सबसे बड़े पर्व यानी चुनावों की शुचिता पूरी तरह से मतदाता सूची की सटीकता पर निर्भर करती है। लेकिन कर्नाटक से मतदाता सूची के शुद्धिकरण को लेकर एक ऐसा चौंकाने वाला आंकड़ा सामने आया है, जिसने राजनीतिक दलों, चुनाव विश्लेषकों और नागरिक समाज में भारी हलचल पैदा कर दी है। कर्नाटक चुनाव आयोग द्वारा जारी किए गए ताज़ा मसौदे (Draft Rolls) में राज्य के कुल मतदाताओं की संख्या 4.46 करोड़ बताई गई है, लेकिन सबसे अधिक हैरानी की बात यह है कि इस पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान राज्य से रिकॉर्ड 1.07 करोड़ मतदाताओं के नाम सूची से हटा (Deleted) दिए गए हैं।

इतने विशाल पैमाने पर—लगभग 20 प्रतिशत से अधिक—मतदाताओं के नाम काटे जाना भारत के चुनावी इतिहास की सबसे अभूतपूर्व घटनाओं में से एक है। 24 अगस्त 2026 को बेंगलुरु में आयोजित एक अहम प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (Chief Electoral Officer) वी. अंबु कुमार ने विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) के इन आंकड़ों को सार्वजनिक किया। चुनाव आयोग का स्पष्टीकरण है कि यह एक पारदर्शी ‘सफाई अभियान’ है जिसका उद्देश्य मतदाता सूची को त्रुटिहीन बनाना है।

चुनाव आयोग के अनुसार, जिन 1.07 करोड़ नामों को सूची से हटाया गया है, वे मुख्य रूप से ‘अनुपस्थित, स्थानांतरित, डुप्लिकेट या मृत’ (absent, shifted, duplicate, dead) की श्रेणी में आते थे। आयोग का तर्क है कि पिछले कई वर्षों से सूचियों में जमे हुए इन फर्जी या निष्क्रिय नामों के कारण मतदान प्रतिशत के वास्तविक आंकड़े प्रभावित होते थे और चुनावी धांधली की गुंजाइश बनी रहती थी। इसे सुधारने के लिए ही यह ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) चलाया गया था।

हालांकि, 1.07 करोड़ नाम काटे जाने के इस आधिकारिक तर्क ने विपक्ष और सामाजिक कार्यकर्ताओं को संतुष्ट नहीं किया है। राजनीतिक हलकों में यह डर सता रहा है कि ‘शिफ्टेड’ (स्थानांतरित) या ‘एब्सेंट’ (अनुपस्थित) बताकर कहीं जानबूझकर किसी विशेष समुदाय, गरीब प्रवासियों या झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले वैध मतदाताओं को तो उनके मताधिकार से वंचित नहीं कर दिया गया है? इतनी बड़ी संख्या में विलोपन किसी भी चुनाव के परिणाम को पूरी तरह से पलटने की क्षमता रखता है।

इस भारी विवाद और उठ रहे सवालों को देखते हुए, चुनाव आयोग ने घोषणा की है कि जिन क्षेत्रों में विलोपन की दर असामान्य रूप से उच्च रही है, वहां एक ‘विशेष अभियान’ (Special campaign) चलाया जाएगा। इस अभियान के तहत नागरिकों को यह मौका दिया जाएगा कि वे ड्राफ्ट सूची की जांच करें और यदि उनका नाम गलती से काट दिया गया है, तो वे उचित दावों और आपत्तियों (Claims and Objections) के माध्यम से अपना नाम फिर से जुड़वा सकें। बहरहाल, 1 करोड़ से अधिक नामों की इस ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ ने कर्नाटक की राजनीति में एक नया और बेहद संवेदनशील मुद्दा खड़ा कर दिया है।