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सोनिया गांधी की एनएसी क्या सचमुच थी दिमागी नक्सल के शासन का सबसे खतरनाक चेहरा प्रधानमंत्री के इस बड़े बयान ने कांग्रेस की बढ़ाई मुश्किलें

नई दिल्ली ( राघवेंद्र प्रताप सिंह) : देश की राजनीति में इन दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिए गए ‘दिमागी नक्सल’ वाले बयान पर भूचाल आया हुआ है। स्वतंत्रता दिवस के अपने भाषण के बाद से ही यह शब्द राजनीतिक गलियारों और वैचारिक मंचों पर सबसे बड़ी चर्चा का विषय बन चुका है। इसी कड़ी में अब एक नया और तीखा वैचारिक आलेख सामने आया है जिसमें कांग्रेस नीत यूपीए सरकार के दौरान सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद यानी एनएसी (NAC) को ‘दिमागी नक्सल के शासन का सबसे बेहतरीन और सटीक उदाहरण’ बताया गया है। इस लेख में यह गंभीर आरोप लगाया गया है कि कैसे उस दौर में बिना किसी संवैधानिक जवाबदेही के गुप्त एजेंडे चलाए जाते थे और देश की चुनी हुई संसद को एक तरह से रबर स्टाम्प बना दिया गया था।

क्या थी एनएसी और क्यों इस पर खड़े होते रहे हैं गंभीर संवैधानिक सवाल :

जब केंद्र में मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार सत्ता में थी, तब सरकार से ऊपर एक सुपर कैबिनेट की तरह ‘राष्ट्रीय सलाहकार परिषद’ (NAC) का गठन किया गया था जिसकी कमान सीधे सोनिया गांधी के हाथों में थी। इसमें देश भर के तमाम वामपंथी झुकाव वाले एनजीओ कार्यकर्ता, एक्टिविस्ट और बुद्धिजीवी भरे हुए थे जिन्हें जनता ने कभी चुनकर संसद नहीं भेजा था। लेकिन हैरानी की बात यह थी कि देश के नीतिगत फैसले, कानून और योजनाएं संसद में बहस से पहले इस परिषद के कमरों में तय होती थीं। आलोचकों और राजनीतिक विश्लेषकों का हमेशा से यह मानना रहा है कि यह व्यवस्था भारतीय संविधान के बुनियादी ढांचे यानी लोकतांत्रिक जवाबदेही और संसद की सर्वोच्चता पर एक बहुत बड़ा सीधा प्रहार थी।

संसद को दरकिनार कर गुप्त एजेंडे चलाने और एनजीओ के जरिए शासन का खेल
लेख में इस बात का गहराई से विश्लेषण किया गया है कि कैसे ‘दिमागी नक्सल’ से प्रभावित इस व्यवस्था ने देश के भीतर एक समानांतर सत्ता केंद्र खड़ा कर दिया था। चुने हुए प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद की जो संवैधानिक शक्तियां थीं, उन्हें दरकिनार करके चुनिंदा गैर-सरकारी संगठनों और विशेष वैचारिक पृष्ठभूमि वाले लोगों के हाथों में देश की नीतियों की कमान सौंप दी गई थी। इस तरह के तंत्र में पारदर्शिता का पूरी तरह अभाव होता है। इसमें देश के विकास को बाधित करने वाले और समाज को वैचारिक रूप से बांटने वाले गुप्त एजेंडे पर्दे के पीछे से चलाए जाते हैं। जनता के टैक्स का पैसा उन संस्थाओं और योजनाओं में झोंक दिया जाता है जो देश के दीर्घकालिक हितों के बजाय एक खास वैचारिक लॉबी को मजबूत करती हैं।

आर्थिक विकास पर ब्रेक और नीतिगत पक्षाघात का काला दौर

उस दौर को याद करते हुए विश्लेषक अक्सर ‘पॉलिसी पैरालिसिस’ यानी नीतिगत पक्षाघात शब्द का इस्तेमाल करते हैं। जब देश में शासन चलाने वाले लोग व्यावहारिक अर्थशास्त्र और राष्ट्रीय सुरक्षा के बजाय कुछ खास अतिवादी वैचारिक सिद्धांतों से निर्देशित होने लगते हैं, तो देश की अर्थव्यवस्था का क्या हाल होता है, यह यूपीए के दूसरे कार्यकाल में साफ देखा गया था। बड़े बुनियादी ढांचे के प्रोजेक्ट्स को पर्यावरण और आदिम अधिकारों के नाम पर अटका दिया गया, औद्योगिक विकास की गति धीमी हो गई और देश में एक ऐसा माहौल बना दिया गया मानो हर विकास कार्य जनविरोधी हो। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ‘दिमागी नक्सल’ का जो जिक्र किया गया है, उसका एक बहुत बड़ा ऐतिहासिक और व्यावहारिक प्रमाण यही व्यवस्था थी जिसने देश को वैचारिक रूप से जकड़ कर रख दिया था।

पारदर्शी लोकतंत्र और जनादेश की सर्वोच्चता ही असली रास्ता
आज जब देश तेजी से आत्मनिर्भरता, पारदर्शी गवर्नेंस और डिजिटल विकास की ओर बढ़ रहा है, तब इस बात की बहुत गहरी आवश्यकता है कि हम अतीत की उन व्यवस्थाओं का मूल्यांकन करें जिन्होंने देश की प्रगति में ब्रेक लगाने का काम किया था। लोकतंत्र का मतलब केवल वोट डालना नहीं है, बल्कि उसका मतलब यह है कि देश की नीतियां संसद के पटल पर खुली बहस के बाद चुनी हुई सरकार द्वारा बनाई जाएं, न कि किसी बंद कमरे में बैठी गैर-संवैधानिक कमेटियों के गुप्त एजेंडों के तहत। सोनिया गांधी की एनएसी और उस दौर की कार्यशैली आज भी इस बात का सबसे बड़ा सबक है कि जब राष्ट्रहित से ऊपर वैचारिक जिद और परोक्ष नियंत्रण को प्राथमिकता दी जाती है, तो देश को कितनी भारी कीमत चुकानी पड़ती है।