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उत्तराखंड में मंडरा रहा ‘जलबम’ का खतरा: 13 हाई-रिस्क ग्लेशियर झीलें कभी भी ला सकती हैं भारी तबाही, यहाँ देखें पूरी लिस्ट

देहरादून : नेपाल की हालिया जल त्रासदी के बाद उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों के लिए एक बड़ा और गंभीर खतरा सामने आया है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) और वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान की साझा रिपोर्ट के अनुसार, राज्य के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में 13 ऐसी ग्लेशियर झीलें चिन्हित की गई हैं जो किसी ‘जलबम’ की तरह कभी भी फट सकती हैं। पहाड़ों पर लगातार हो रहे अनियोजित निर्माण, सुरंगों और जलविद्युत परियोजनाओं के लिए हो रहे खनन ने इन झीलों के खतरे को और अधिक बढ़ा दिया है।सबसे खतरनाक और संवेदनशील 13 ग्लेशियर झीलेंNDMA और वाडिया संस्थान की रिपोर्ट में उत्तराखंड की कुल 13 झीलों को अत्यधिक जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है। इनमें से पांच प्रमुख झीलों को सबसे ज्यादा खतरनाक माना गया है:वसुधारा ताल (चमोली जिला)नामविहीन झील (जोशीमठ क्षेत्र)सयांत्यांकती झील (पिथौरागढ़, दारमा और कुटियांगली घाटी)माबोंग झील (पिथौरागढ़, लासरयांगती घाटी के पास)प्युंगरू झील (चीन सीमा से सटा संवेदनशील ग्लेशियर क्षेत्र)सरस्वती ताल (चमोली जिला)केदारताल (उत्तरकाशी जिला)किन इलाकों पर मंडरा रहा है सबसे बड़ा खतरायदि उच्च हिमालयी क्षेत्रों में इनमें से कोई भी ग्लेशियर झील फटती है, तो अलकनंदा और भागीरथी नदी घाटियों में भारी तबाही मच सकती है। चमोली, जोशीमठ, तपोवन, रैणी, कर्णप्रयाग और नंदप्रयाग जैसे इलाकों में अलकनंदा का जलस्तर अचानक बढ़ने से भयंकर बाढ़ आ सकती है। वहीं, केदारताल या गंगोत्री के पास स्थित झीलों के टूटने से भागीरथी नदी उफान पर आ सकती है, जिससे उत्तरकाशी शहर, हर्षिल, झाला और मनेरी के इलाके सीधे तौर पर प्रभावित होंगे। इसके अलावा ऋषिकेश के त्रिवेणी घाट, लक्ष्मण झूला, राम झूला और हरिद्वार में हर की पौड़ी, कांगड़ा घाट व चंडी घाट जैसे तटीय क्षेत्र भी जलमग्न हो सकते हैं।सरकार ने उठाए कौन से कड़े कदमइस संभावित आपदा से निपटने के लिए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक कर सख्त निर्देश जारी किए हैं। सरस्वती ताल (चमोली) और केदारताल (उत्तरकाशी) के विस्तृत वैज्ञानिक सर्वेक्षण के लिए तुरंत विशेषज्ञ टीमों को भेजा जा रहा है। इसके साथ ही संवेदनशील झीलों पर अत्याधुनिक वाटर-लेवल सेंसर, ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन और सैटेलाइट आधारित सायरन सिस्टम लगाने के निर्देश दिए गए हैं ताकि समय रहते लोगों को सतर्क किया जा सके। झीलों के अतिरिक्त पानी को सुरक्षित तरीके से बाहर निकालकर उनके दबाव को कम करने की योजना पर भी तेजी से काम चल रहा है।